दिल्ली में बारापुल्ला एलिवेटेड कॉरिडोर के Phase III के शुरू होने के बाद पहले ही दिन यातायात व्यवस्था को लेकर कई सवाल खड़े हो गए। जिस परियोजना को दिल्ली के पूर्वी और दक्षिणी हिस्सों के बीच तेज और सिग्नल-फ्री कनेक्टिविटी देने के उद्देश्य से तैयार किया गया था, उसे पूरा होने में करीब एक दशक लग गया। इस दौरान दिल्ली और आसपास के NCR क्षेत्रों में वाहनों की संख्या तेजी से बढ़ गई और शहर की ट्रैफिक जरूरतें भी बदल गईं।

बारापुल्ला Phase III का उद्देश्य मयूर विहार से AIIMS तक करीब 10 किलोमीटर लंबे एलिवेटेड कॉरिडोर के जरिए कनेक्टिविटी बेहतर करना था। परियोजना से उम्मीद थी कि दोनों क्षेत्रों के बीच यात्रा का समय काफी कम होगा। लेकिन कॉरिडोर के उद्घाटन के बाद पहले दिन ही कई हिस्सों में लंबा ट्रैफिक जाम देखने को मिला और प्रस्तावित तेज यात्रा की उम्मीदों पर सवाल उठने लगे।

कॉमनवेल्थ गेम्स के समय शुरू हुई थी बारापुल्ला परियोजना

बारापुल्ला कॉरिडोर की मूल योजना उस समय तैयार की गई थी जब दिल्ली 2010 कॉमनवेल्थ गेम्स की तैयारी कर रही थी। इसका मुख्य उद्देश्य पूर्वी और दक्षिणी दिल्ली के बीच एक ऐसा सिग्नल-फ्री मार्ग तैयार करना था, जिससे मौजूदा सड़कों पर वाहनों का दबाव कम हो सके।

परियोजना को कुल चार चरणों में विकसित करने की योजना बनाई गई थी।

Phase I में सराय काले खां से जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम तक का हिस्सा शामिल था। इसका निर्माण दिसंबर 2008 में शुरू हुआ और 2010 कॉमनवेल्थ गेम्स से पहले इसे पूरा कर लिया गया।

इसके बाद Phase II के जरिए कॉरिडोर को INA की दिशा में आगे बढ़ाया गया। वहीं Phase III के तहत सराय काले खां और मयूर विहार को यमुना के पार जोड़ने की योजना बनाई गई।

Phase IV में इस कॉरिडोर को आगे चलकर एयरपोर्ट की दिशा में बढ़ाने की परिकल्पना की गई थी। हालांकि Phase IV का निर्माण अभी शुरू नहीं हुआ है और इसकी योजना की समीक्षा की जा रही है।

पूरे बारापुल्ला कॉरिडोर को शुरुआती योजना के मुताबिक 2017 तक पूरी तरह चालू करने का लक्ष्य रखा गया था।

2015 में शुरू हुआ था Phase III का निर्माण

बारापुल्ला Phase III का निर्माण अप्रैल 2015 में शुरू हुआ था और इसे अक्टूबर 2017 तक पूरा करने का लक्ष्य था। परियोजना का बड़ा हिस्सा समय के साथ तैयार हो गया, लेकिन यमुना के पूर्वी किनारे पर करीब 2.5 एकड़ निजी कृषि भूमि के अधिग्रहण का मामला अटक गया।

इस जमीन के कारण लगभग 900 मीटर का अंतिम हिस्सा लंबे समय तक अधूरा रहा।

जानकारी के अनुसार, जिस जमीन को निर्माण के लिए उपलब्ध माना गया था, उसे 1995 में डिनोटिफाई कर मूल मालिकों को वापस कर दिया गया था। जुलाई 2015 में DDA, PWD और राजस्व अधिकारियों के संयुक्त निरीक्षण के दौरान इस स्थिति का पता चला। तब तक परियोजना का निर्माण शुरू हो चुका था।

जमीन के मालिकों ने बाद में दिल्ली हाईकोर्ट का रुख किया। बातचीत से समाधान नहीं निकलने के बाद औपचारिक अधिग्रहण प्रक्रिया शुरू हुई। जमीन से जुड़ा विवाद और कानूनी प्रक्रिया 2023 तक चली और इसके बाद अंतिम मंजूरी मिलने में भी समय लगा।

नतीजा यह हुआ कि परियोजना का अधिकांश हिस्सा तैयार होने के बावजूद आखिरी हिस्से के कारण पूरा कॉरिडोर वर्षों तक अधूरा रहा।

जब तक परियोजना पूरी हुई, दिल्ली की ट्रैफिक तस्वीर बदल चुकी थी

बारापुल्ला Phase III की सबसे बड़ी चुनौती केवल निर्माण में हुई देरी नहीं रही। करीब एक दशक के दौरान दिल्ली और आसपास के NCR क्षेत्रों में वाहनों की संख्या और आबादी दोनों में बड़ा बदलाव आया।

VAHAN पोर्टल के आंकड़ों के अनुसार, 2008 में दिल्ली में पंजीकृत वाहनों की संख्या करीब 55 लाख थी। 2017 तक यह संख्या 1 करोड़ से अधिक हो गई थी। बाद में पुराने वाहनों के बड़े पैमाने पर डी-रजिस्ट्रेशन के कारण यह आंकड़ा घटकर करीब 88 लाख रह गया।

हालांकि, दिल्ली के ट्रैफिक पर केवल दिल्ली में पंजीकृत वाहन ही असर नहीं डालते। नोएडा, गाजियाबाद, गुरुग्राम, फरीदाबाद और NCR के अन्य क्षेत्रों से रोजाना बड़ी संख्या में वाहन दिल्ली में आते-जाते हैं।

इसी दौरान पूर्वी दिल्ली के साथ-साथ नोएडा और गाजियाबाद में भी आबादी और वाहनों की संख्या में तेजी से वृद्धि हुई।

उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, नोएडा में पंजीकृत वाहनों की संख्या 2017 के करीब 6 लाख से बढ़कर 2026 में लगभग 13 लाख हो गई। वहीं गाजियाबाद में यह संख्या करीब 9 लाख से बढ़कर लगभग 16.5 लाख तक पहुंच गई।

इस बढ़ते ट्रैफिक का सीधा असर बारापुल्ला Phase III पर पड़ना स्वाभाविक था, क्योंकि यह कॉरिडोर इन्हीं क्षेत्रों से आने-जाने वाले वाहनों के लिए महत्वपूर्ण मार्ग है।

पुरानी ट्रैफिक स्टडी के आधार पर तैयार हुआ डिजाइन

Phase III की योजना और डिजाइन तैयार करने के दौरान कई अध्ययन किए गए थे। 2012 की प्री-फीजिबिलिटी स्टडी में अलग-अलग अलाइनमेंट विकल्पों पर विचार किया गया था।

इन विकल्पों का मूल्यांकन कनेक्टिविटी, निर्माण की व्यवहारिकता, सुरक्षा, भविष्य में विस्तार की संभावना और ट्रैफिक मूवमेंट जैसे पहलुओं पर किया गया। इसके बाद मयूर विहार Phase-I वाला अलाइनमेंट चुना गया।

2018 की सोशल इम्पैक्ट असेसमेंट (SIA) रिपोर्ट के समय तक अलाइनमेंट को अंतिम रूप दिया जा चुका था। तब तक निर्माण काफी आगे बढ़ चुका था, इसलिए इसमें बदलाव करना व्यावहारिक नहीं माना गया।

यही वजह है कि परियोजना की मूल योजना और आज की ट्रैफिक जरूरतों के बीच अंतर अब साफ दिखाई दे रहा है।

विशेषज्ञों ने क्षमता और डिजाइन को लेकर उठाए सवाल

सेंट्रल रोड रिसर्च इंस्टीट्यूट (CRRI) के पूर्व चीफ साइंटिस्ट और ट्रैफिक इंजीनियरिंग एंड सेफ्टी डिविजन के प्रमुख एस. वेलमुरुगन के मुताबिक, अगर इसी कॉरिडोर को आज के ट्रैफिक वॉल्यूम को ध्यान में रखकर डिजाइन किया जाता, तो इसकी क्षमता अधिक रखनी पड़ सकती थी।

उनके अनुसार, मौजूदा ट्रैफिक और हर साल वाहनों में होने वाली वृद्धि को देखते हुए कॉरिडोर में कम से कम 4+4 लेन की क्षमता पर विचार किया जा सकता था। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि 2008-10 के दौरान भविष्य की इतनी बड़ी वृद्धि का अनुमान लगाना मुश्किल हो सकता था।

एलिवेटेड कॉरिडोर में निर्माण पूरा होने के बाद क्षमता बढ़ाना सामान्य सड़क की तुलना में काफी मुश्किल होता है। पियर्स और स्ट्रक्चर एक निश्चित ट्रैफिक लोड को ध्यान में रखकर डिजाइन किए जाते हैं। इसलिए बाद में इसमें बड़ा बदलाव करना आसान नहीं होता।

उद्घाटन से पहले सुरक्षा ऑडिट की जरूरत

विशेषज्ञों ने यह भी कहा कि कॉरिडोर के निर्माण के बाद और इसे पूरी तरह जनता के लिए खोलने से पहले रोड सेफ्टी ऑडिट किया जाना जरूरी था।

ऐसा ऑडिट सड़क की ज्यामिति, तीखे मोड़, लेन मर्जिंग, एंट्री-एग्जिट और अन्य संभावित समस्याओं की पहचान कर सकता है।

Phase III के खुलने के बाद सामने आई ट्रैफिक समस्याओं में अचानक लेन खत्म होना, वाहनों का मर्ज होना और कुछ स्थानों पर तेज कोण वाले मोड़ जैसे मुद्दे शामिल हैं। इन समस्याओं की पहचान पहले से होने पर ट्रैफिक को नियंत्रित करने के लिए कुछ बदलाव किए जा सकते थे।

PWD से इस संबंध में सवाल पूछे गए, लेकिन खबर प्रकाशित होने तक विभाग की ओर से जवाब नहीं मिला था।

अब ट्रैफिक मैनेजमेंट पर रहेगा जोर

अब जब कॉरिडोर का निर्माण पूरा हो चुका है, तो विशेषज्ञों के मुताबिक पूरा ध्यान ट्रैफिक मैनेजमेंट पर देना होगा। संरचना को दोबारा बड़े स्तर पर बदलना आसान नहीं है।

वाहनों को एक साथ बड़ी संख्या में कॉरिडोर में प्रवेश करने से रोकना, चरणबद्ध तरीके से ट्रैफिक छोड़ना और महत्वपूर्ण स्थानों पर सिग्नल मैनेजमेंट जैसे उपाय किए जा सकते हैं।

ट्रैफिक पुलिस की तैनाती भी अहम हो सकती है, ताकि किसी एक समय पर अत्यधिक संख्या में वाहन कॉरिडोर में प्रवेश न कर जाएं और bottleneck की स्थिति पैदा न हो।

इसके अलावा Google Maps जैसी navigation services के जरिए वाहनों को वैकल्पिक रास्तों पर डायवर्ट करने से भी बारापुल्ला पर एकतरफा ट्रैफिक दबाव कम करने में मदद मिल सकती है।

15 मिनट की यात्रा का दावा अब चुनौती

बारापुल्ला Phase III को लेकर शुरुआत में मयूर विहार से AIIMS तक यात्रा करीब 15 मिनट में पूरी होने की उम्मीद जताई गई थी। लेकिन मौजूदा ट्रैफिक परिस्थितियों में यह समय हर स्थिति में हासिल करना मुश्किल हो सकता है।

विशेषज्ञों के मुताबिक ट्रैफिक की वास्तविक स्थिति को देखते हुए यात्रा समय को लेकर व्यावहारिक अपेक्षाएं तय करना जरूरी है। प्रभावी ट्रैफिक मैनेजमेंट के साथ अगर यात्रा का समय 25-30 मिनट के आसपास भी रहता है, तो यह मौजूदा मार्गों की तुलना में महत्वपूर्ण सुधार हो सकता है।

बारापुल्ला Phase III का निर्माण आखिरकार पूरा हो गया है, लेकिन परियोजना के सामने अब एक नई चुनौती है—ऐसे ट्रैफिक को संभालना जो उस समय की तुलना में काफी बढ़ चुका है, जब इस कॉरिडोर की मूल योजना तैयार की गई थी।

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By EDITOR

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