Cockroach Janta Party (CJP) के मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर आयोजित प्रदर्शन से पहले दिल्ली में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई। शनिवार को जंतर-मंतर की ओर जाने वाले कई रास्तों पर दिल्ली पुलिस ने बैरिकेडिंग की, वाहनों की आवाजाही रोकी और कुछ स्थानों पर ट्रैफिक को दूसरे रास्तों की ओर मोड़ दिया। इस कार्रवाई के बाद सवाल उठता है कि आखिर दिल्ली पुलिस को सड़कों पर बैरिकेड लगाने, वाहनों की जांच करने और सार्वजनिक रास्तों को बंद करने का अधिकार किस कानून के तहत मिलता है?

इसका जवाब दिल्ली पुलिस अधिनियम, 1978 (Delhi Police Act, 1978) में मिलता है। यह कानून पुलिस आयुक्त को सार्वजनिक स्थानों के अस्थायी इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाने, वाहनों की जांच के लिए बैरियर लगवाने और यातायात को नियंत्रित करने से जुड़े अधिकार देता है। हालांकि, इन शक्तियों के इस्तेमाल के लिए कानून में कुछ शर्तें भी निर्धारित की गई हैं।

CJP के प्रदर्शन के दौरान दिल्ली पुलिस ने राजधानी के कई हिस्सों में सुरक्षा इंतजाम किए। जंतर-मंतर की ओर जाने वाले रास्तों पर बैरिकेड लगाए गए और संभावित प्रवेश मार्गों पर पुलिसकर्मियों की तैनाती की गई। ऐसे में यह समझना जरूरी है कि दिल्ली पुलिस अधिनियम में इन व्यवस्थाओं को लेकर क्या प्रावधान हैं और पुलिस किन परिस्थितियों में इनका इस्तेमाल कर सकती है।

दिल्ली पुलिस ने जंतर-मंतर के आसपास क्यों की बैरिकेडिंग?

CJP ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर दिल्ली के जंतर-मंतर पर प्रदर्शन का आह्वान किया था। प्रदर्शन को देखते हुए पुलिस ने जंतर-मंतर तक पहुंचने वाले रास्तों पर सुरक्षा बढ़ा दी।

रिपोर्ट के मुताबिक, टॉल्स्टॉय मार्ग और संसद मार्ग के चौराहे पर बैरिकेड की कई परतें लगाई गईं, जिससे प्रदर्शन स्थल की ओर जाने वाले लोगों और वाहनों की आवाजाही रोकी जा सके। कनॉट प्लेस के आउटर सर्कल पर अशोक रोड राउंडअबाउट की ओर जाने वाले मार्ग को भी बंद किया गया और ट्रैफिक को दूसरी तरफ मोड़ा गया।

एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी के मुताबिक, प्रदर्शनकारियों के संभावित प्रवेश को रोकने के लिए 37 चिन्हित स्थानों पर बैरिकेड लगाए गए थे। इसके अलावा, मध्य दिल्ली और नई दिल्ली जिलों की सीमाओं के साथ-साथ दक्षिण, दक्षिण-पूर्व और दक्षिण-पश्चिम जिलों से जुड़ने वाले मार्गों पर भी पुलिस पिकेट लगाए गए।

इन व्यवस्थाओं का उद्देश्य प्रदर्शन के दौरान सुरक्षा बनाए रखना और भीड़ की आवाजाही को नियंत्रित करना था। हालांकि, किसी खास सड़क को बंद करने या बैरिकेड लगाने की वैधता संबंधित आदेश और कानून में निर्धारित शर्तों पर निर्भर करती है।

क्या है दिल्ली पुलिस अधिनियम, 1978?

दिल्ली पुलिस अधिनियम, 1978 को दिल्ली में पुलिस व्यवस्था और उसके अधिकारों को नियंत्रित करने के लिए बनाया गया था। यह कानून 1 जुलाई 1978 से प्रभावी हुआ और इसके तहत दिल्ली के लिए एक पुलिस बल की व्यवस्था की गई।

दिल्ली पुलिस का नेतृत्व पुलिस आयुक्त करते हैं, जिनकी नियुक्ति प्रशासक के माध्यम से होती है। दिल्ली के संदर्भ में प्रशासक की भूमिका उपराज्यपाल (Lieutenant Governor) निभाते हैं।

इस अधिनियम के तहत कई महत्वपूर्ण अधिकार पुलिस आयुक्त को दिए गए हैं। पुलिस उपायुक्त, अतिरिक्त पुलिस उपायुक्त और सहायक पुलिस आयुक्त भी पुलिस आयुक्त के आदेश पर इनमें से कुछ शक्तियों का इस्तेमाल कर सकते हैं।

कानून में सड़क की परिभाषा भी व्यापक रखी गई है। इसमें राजमार्ग, पुल, सड़कें, गलियां, फुटपाथ, चौक और सार्वजनिक इस्तेमाल के लिए खुले अन्य रास्ते शामिल हैं। इसका मतलब है कि अधिनियम के प्रावधान केवल बड़ी सड़कों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि सार्वजनिक आवाजाही के लिए इस्तेमाल होने वाले कई अन्य स्थानों पर भी लागू हो सकते हैं।

धारा 36(1): सार्वजनिक रास्ते को अस्थायी रूप से बंद करने का अधिकार

दिल्ली पुलिस अधिनियम की धारा 36(1) पुलिस आयुक्त को किसी सार्वजनिक उद्देश्य के लिए किसी सड़क या सार्वजनिक स्थान को अस्थायी रूप से आरक्षित करने का अधिकार देती है। इसके लिए सार्वजनिक सूचना जारी करने का प्रावधान है।

जब किसी सड़क या स्थान को इस तरह आरक्षित किया जाता है, तो पुलिस आयुक्त वहां लोगों के प्रवेश पर रोक लगा सकते हैं या प्रवेश के लिए कुछ शर्तें निर्धारित कर सकते हैं।

हालांकि, इस अधिकार के इस्तेमाल के साथ कानून में तीन अहम बातें जुड़ी हैं:

  • अस्थायी व्यवस्था: सड़क या सार्वजनिक स्थान को इस प्रावधान के तहत अस्थायी रूप से आरक्षित किया जा सकता है।

  • सार्वजनिक उद्देश्य: प्रतिबंध किसी सार्वजनिक उद्देश्य के लिए होना चाहिए।

  • सार्वजनिक सूचना: कानून के अनुसार इस व्यवस्था की जानकारी सार्वजनिक सूचना के माध्यम से दी जानी चाहिए।

इस प्रावधान के तहत सड़क या सार्वजनिक स्थान पर प्रतिबंध लगाने की शक्ति पुलिस को मिलती है, लेकिन इसका इस्तेमाल कानून में निर्धारित शर्तों के अनुसार ही किया जाना चाहिए।

धारा 36(2): वाहनों की जांच के लिए बैरियर लगाने का अधिकार

दिल्ली पुलिस अधिनियम की धारा 36(2) में बैरियर लगाने से संबंधित प्रावधान है। इसके तहत पुलिस आयुक्त जरूरत महसूस होने पर पुलिस अधिकारियों को सड़क पर बैरियर लगाने की अनुमति दे सकते हैं।

इसका उद्देश्य सड़क पर चल रहे वाहनों को अस्थायी रूप से रोकना और यह जांचना है कि वाहन, उसका चालक या वाहन के प्रभारी व्यक्ति ने किसी कानून का उल्लंघन तो नहीं किया है।

इस प्रावधान के तहत पुलिस आयुक्त बैरियर के इस्तेमाल से जुड़े निर्देश भी जारी कर सकते हैं।

कानून में वाहन की परिभाषा भी व्यापक है। इसमें कार, गाड़ी, ठेला, वैन, ट्रक, हाथगाड़ी, साइकिल, तिपहिया वाहन, रिक्शा और मोटर वाहन जैसे साधन शामिल हैं। अधिनियम की परिभाषा में कुछ अन्य परिवहन साधनों का भी उल्लेख है।

इसलिए पुलिस द्वारा वाहन जांच के लिए बैरियर लगाना केवल प्रदर्शन के समय लागू होने वाली व्यवस्था नहीं है। यह दिल्ली पुलिस अधिनियम में दी गई एक कानूनी शक्ति है। लेकिन धारा 36(2) के तहत बैरियर लगाने के लिए पुलिस आयुक्त की अनुमति और कानून में बताए गए उद्देश्य का पालन जरूरी है।

धारा 28: ट्रैफिक नियंत्रण और सड़क बंद करने के नियम

दिल्ली पुलिस अधिनियम की धारा 28 पुलिस आयुक्त को राजपत्र में अधिसूचना जारी करके यातायात से संबंधित नियम बनाने की शक्ति देती है। इन नियमों का उद्देश्य सार्वजनिक स्थानों पर लोगों की आवाजाही को व्यवस्थित करना और खतरे, रुकावट या असुविधा को रोकना है।

इस धारा के तहत बनाए जा सकने वाले नियमों में कई विषय शामिल हैं:

  • सड़कों और सार्वजनिक स्थानों पर पैदल चलने, साइकिल चलाने और वाहन चलाने के नियम।

  • सार्वजनिक रास्तों पर वाहनों को खड़ा करने से संबंधित शर्तें।

  • कुछ परिस्थितियों में सड़कों या सार्वजनिक स्थानों को अस्थायी रूप से बंद करने की व्यवस्था।

  • यातायात में बाधा और लोगों को होने वाली असुविधा को रोकने के उपाय।

धारा 28 के तहत बनाए गए नियम प्रशासक के नियंत्रण के अधीन होते हैं। सड़क बंद करने से जुड़े प्रावधान सहित इस धारा के अन्य निर्धारित नियमों के लिए प्रशासक की पूर्व मंजूरी की आवश्यकता होती है।

इसका अर्थ है कि पुलिस आयुक्त के पास यातायात नियंत्रित करने की शक्ति जरूर है, लेकिन धारा 28 के तहत नियम बनाने की प्रक्रिया में कानून द्वारा निर्धारित प्रशासनिक मंजूरी और अधिसूचना की शर्तें भी महत्वपूर्ण हैं।

क्या इन नियमों की जानकारी पहले से देना जरूरी है?

दिल्ली पुलिस अधिनियम के तहत धारा 28 के अंतर्गत बनाए जाने वाले नियमों को सामान्य तौर पर लागू होने से पहले प्रकाशित करने का प्रावधान है।

नियम जारी होने के बाद प्रभावित इलाके में लोगों को इसकी जानकारी देने के लिए प्रमुख स्थानों पर उनकी प्रतियां लगाई जा सकती हैं। इसके अलावा, ढोल बजाकर मुनादी करने या हिंदी, उर्दू और अंग्रेजी के स्थानीय समाचार पत्रों में विज्ञापन प्रकाशित करने जैसे तरीकों का इस्तेमाल किया जा सकता है। कानून में कम से कम दो निर्धारित तरीकों के इस्तेमाल का भी प्रावधान दिया गया है। पुलिस आयुक्त उपयुक्त समझे जाने वाले अन्य तरीकों से भी सूचना दे सकते हैं।

हालांकि, कानून में एक अपवाद भी है। यदि पुलिस आयुक्त को लगता है कि परिस्थितियों के कारण किसी नियम को तत्काल लागू करना जरूरी है, तो वह पहले से प्रकाशन की प्रक्रिया को छोड़ सकते हैं।

इसलिए हर स्थिति में पूर्व सूचना की आवश्यकता को एक जैसा नहीं माना जा सकता। यह इस बात पर निर्भर करता है कि कार्रवाई किस कानूनी प्रावधान के तहत की जा रही है और उस पर कौन-सी शर्तें लागू होती हैं।

बैरिकेड पर पुलिस को क्या अधिकार मिलते हैं?

दिल्ली पुलिस अधिनियम के तहत पुलिस अधिकारियों की जिम्मेदारियों में सड़कों पर यातायात को नियंत्रित करना, अवरोध रोकना और लागू नियमों का पालन सुनिश्चित करना शामिल है।

यदि कोई व्यक्ति अधिनियम के तहत बनाए गए नियमों या जारी आदेशों का उल्लंघन करता है, तो पुलिस अधिकारी उसे नियमों का पालन करने के लिए कह सकते हैं। अधिकारी उल्लंघन करने वाले व्यक्ति को संबंधित गतिविधि रोकने का निर्देश भी दे सकते हैं।

धारा 28 के तहत बनाए गए यातायात नियमों का उल्लंघन उन अपराधों में शामिल हो सकता है, जिनमें पुलिस कानून के अनुसार बिना वारंट गिरफ्तारी कर सकती है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि हर बैरिकेड के पास मौजूद व्यक्ति को केवल वहां होने के कारण गिरफ्तार किया जा सकता है। कार्रवाई के लिए संबंधित कानूनी आधार और परिस्थितियां महत्वपूर्ण होती हैं।

धारा 65: पुलिस के उचित निर्देशों का पालन करना जरूरी

दिल्ली पुलिस अधिनियम की धारा 65 के अनुसार, लोगों को कानून के तहत ड्यूटी निभा रहे पुलिस अधिकारी के उचित निर्देशों का पालन करना होता है।

यदि कोई व्यक्ति निर्देश का विरोध करता है या उसका पालन करने से इनकार करता है, तो संबंधित अधिकारी उसे वहां से हटा सकता है। कानून में निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार ऐसे व्यक्ति को मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया जा सकता है। मामूली मामलों में, जिस परिस्थिति के कारण व्यक्ति को हटाया गया था, उसके समाप्त होने पर उसे छोड़ा भी जा सकता है।

अधिनियम के अनुसार, ऐसी स्थिति में आगे की कार्रवाई 24 घंटे के भीतर होनी चाहिए।

यह प्रावधान पुलिस को सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने में मदद करता है, लेकिन इसके तहत भी कार्रवाई कानून में निर्धारित प्रक्रिया और शर्तों के अनुसार ही की जानी चाहिए।

CJP प्रदर्शन के मामले में कानून को समझना क्यों जरूरी है?

CJP के प्रदर्शन के दौरान दिल्ली पुलिस ने जंतर-मंतर और आसपास के इलाकों में बैरिकेडिंग की, रास्तों पर नियंत्रण लगाया और यातायात को दूसरी दिशा में मोड़ा। ऐसे कदमों के लिए दिल्ली पुलिस अधिनियम में अलग-अलग कानूनी प्रावधान मौजूद हैं।

धारा 36(1) सार्वजनिक स्थान को अस्थायी रूप से आरक्षित करने से संबंधित है, जबकि धारा 36(2) वाहनों की जांच के लिए बैरियर लगाने का अधिकार देती है। वहीं, धारा 28 यातायात नियंत्रण और कुछ परिस्थितियों में सड़क बंद करने से संबंधित नियम बनाने की व्यवस्था करती है। धारा 65 पुलिस के उचित निर्देशों का पालन करने की जिम्मेदारी से जुड़ी है।

लेकिन इन प्रावधानों को एक-दूसरे का विकल्प नहीं समझना चाहिए। किसी विशेष सड़क को बंद करने, वाहनों को रोकने या किसी व्यक्ति को हिरासत में लेने की कानूनी वैधता का आकलन संबंधित आदेश, कार्रवाई के आधार और लागू प्रक्रिया को देखकर ही किया जा सकता है।

CJP प्रदर्शन के दौरान हुई बैरिकेडिंग ने एक बार फिर यह सवाल सामने ला दिया है कि सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस को कौन-कौन से अधिकार मिले हैं और उन अधिकारों पर कानून ने क्या शर्तें लगाई हैं।


CJP Protest: दिल्ली पुलिस को बैरिकेडिंग और सड़क बंद करने का अधिकार किस कानून से मिलता है?

CJP प्रदर्शन के बीच दिल्ली में जंतर-मंतर के रास्तों पर बैरिकेडिंग की गई। जानिए दिल्ली पुलिस अधिनियम 1978 की धारा 28, 36 और 65 पुलिस को कौन-कौन से अधिकार देती हैं।

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By EDITOR

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