मुंबई/पुणे: पुणे के चर्चित Mundhwa land deal case में बॉम्बे हाईकोर्ट की टिप्पणी के बाद मामला एक बार फिर चर्चा में है। कोर्ट ने महाराष्ट्र पुलिस से सवाल किया कि जिस कंपनी में एनसीपी सांसद पार्थ पवार की 99 फीसदी हिस्सेदारी है, उस लेनदेन में उन्हें आरोपी क्यों नहीं बनाया गया, जबकि कंपनी के दूसरे प्रमुख हिस्सेदार और निदेशक को आरोपी बनाया गया है।
जस्टिस माधव जमदार की एकल पीठ ने मामले की सुनवाई के दौरान महाराष्ट्र के डीजीपी सदानंद दाते से पुलिस की जांच को लेकर सवाल किए। कोर्ट ने पूछा कि अगर कंपनी में किसी व्यक्ति की 99 फीसदी हिस्सेदारी है और दूसरे व्यक्ति की सिर्फ 1 फीसदी, तो क्या 99 फीसदी हिस्सेदारी रखने वाला व्यक्ति इस लेनदेन का लाभार्थी नहीं माना जाएगा?
हालांकि, कोर्ट की यह टिप्पणी अपराध साबित होने का निष्कर्ष नहीं है। फिलहाल मामले की जांच जारी है और पार्थ पवार को इस मामले में आरोपी नहीं बनाया गया है।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला पुणे के Mundhwa इलाके में करीब 40 एकड़ जमीन के कथित विवादित लेनदेन से जुड़ा है। यह जमीन Mahar Watan land की श्रेणी में आती है और मामले में आरोप है कि सरकारी जमीन को आवश्यक सरकारी मंजूरी के बिना निजी कंपनी Amadea Enterprises LLP को ट्रांसफर किया गया।
जांच और अदालत में सामने आए विवरण के मुताबिक, इस जमीन की कीमत करीब ₹1,800 करोड़ बताई गई थी, जबकि इसका लेनदेन लगभग ₹300 करोड़ में हुआ। इस सौदे में करीब ₹21 करोड़ की स्टांप ड्यूटी छूट का मुद्दा भी सामने आया था।
Mahar Watan जमीन को लेकर महाराष्ट्र में विशेष कानूनी प्रावधान हैं। ऐसी जमीन के हस्तांतरण के लिए सरकारी अनुमति से जुड़े नियम लागू होते हैं।
Amadea Enterprises में किसकी कितनी हिस्सेदारी?
मामले में सामने आए रिकॉर्ड के मुताबिक, Amadea Enterprises LLP में पार्थ पवार की हिस्सेदारी 99 फीसदी है, जबकि दिग्विजय पाटिल की हिस्सेदारी 1 फीसदी बताई गई है।
दिग्विजय पाटिल को पुलिस ने मामले में आरोपी बनाया है। इसके बावजूद पार्थ पवार का नाम FIR में आरोपी के तौर पर नहीं है। इसी अंतर को लेकर हाईकोर्ट ने पुलिस की जांच पर सवाल उठाया।
कोर्ट की टिप्पणी का मुख्य सवाल यही था कि कंपनी में इतनी बड़ी हिस्सेदारी रखने वाले व्यक्ति की भूमिका की जांच किस स्तर तक की गई है।
पुलिस की जांच पर भी कोर्ट की नजर
मामले में पुणे के तहसीलदार सूर्यकांत येवले ने अग्रिम जमानत की मांग की थी। सुनवाई के दौरान यह मुद्दा भी सामने आया कि पार्थ पवार को आरोपी क्यों नहीं बनाया गया।
महाराष्ट्र के डीजीपी सदानंद दाते ने 24 सितंबर को हाईकोर्ट में दाखिल हलफनामे में कहा था कि जांच के दस्तावेजों की विस्तृत समीक्षा के बाद कुछ बिंदुओं पर ज्यादा पेशेवर और विस्तृत जांच की जरूरत है।
डीजीपी ने यह भी कहा कि पुणे पुलिस को सभी उपलब्ध पहलुओं की जांच करने के निर्देश दिए गए हैं। पुलिस आयुक्त को जांच की प्रगति की साप्ताहिक समीक्षा करने और करीब छह सप्ताह बाद डीजीपी कार्यालय को रिपोर्ट देने के निर्देश दिए गए हैं।
अब तक किन लोगों को आरोपी बनाया गया?
मामले में पुलिस ने अब तक दिग्विजय पाटिल, निलंबित सब-रजिस्ट्रार रविंद्र तारू, तहसीलदार सूर्यकांत येवले और पावर ऑफ अटॉर्नी धारक शीतल तेजवानी को आरोपी बनाया है।
इनमें से कुछ आरोपियों ने अपने ऊपर लगे आरोपों से इनकार किया है और अदालत में अपनी भूमिका को लेकर दलीलें दी हैं।
तहसीलदार सूर्यकांत येवले को बॉम्बे हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान अग्रिम जमानत भी दी, साथ ही जांच में सहयोग करने की शर्त रखी गई।
₹21 करोड़ की स्टांप ड्यूटी का मामला भी जुड़ा
Mundhwa land deal में स्टांप ड्यूटी को लेकर भी अलग से कार्रवाई हुई है। महाराष्ट्र के Chief Controlling Revenue Authority ने Amadea Enterprises की उस अपील को खारिज कर दिया था, जिसमें कंपनी ने करीब ₹21 करोड़ की स्टांप ड्यूटी से जुड़ी मांग को चुनौती दी थी।
कंपनी ने कथित तौर पर IT/ITES प्रोजेक्ट के लिए स्टांप ड्यूटी में छूट का दावा किया था और बिक्री दस्तावेज के समय केवल ₹500 स्टांप ड्यूटी का भुगतान किया था। राजस्व प्राधिकरण ने बाद में छूट के दावे को स्वीकार नहीं किया और ₹21 करोड़ की स्टांप ड्यूटी के साथ जुर्माने की मांग को बरकरार रखा।
कोर्ट ने जांच को लेकर क्या कहा?
हाईकोर्ट की मौजूदा टिप्पणी का केंद्र यह है कि जांच में सभी संबंधित लोगों की भूमिका को समान रूप से और तथ्यों के आधार पर देखा जाना चाहिए।
कोर्ट ने पुलिस से यह स्पष्ट करने की जरूरत बताई कि 99 फीसदी हिस्सेदारी रखने वाले व्यक्ति को आरोपी नहीं बनाने के पीछे जांच का आधार क्या है। वहीं पुलिस की ओर से दाखिल हलफनामे में कहा गया है कि मामले में आगे और विस्तृत जांच की आवश्यकता है।
इसका मतलब यह है कि फिलहाल कोर्ट ने पार्थ पवार को दोषी नहीं ठहराया है और न ही उन्हें आरोपी बनाने का आदेश दिया है। अदालत ने मुख्य रूप से जांच की दिशा और उनकी संभावित भूमिका को लेकर सवाल उठाया है।
आगे क्या होगा?
अब इस मामले में पुलिस की आगे की जांच महत्वपूर्ण होगी। डीजीपी के निर्देश के बाद पुणे पुलिस को मामले में उपलब्ध सभी सुरागों और संबंधित लोगों की भूमिका की विस्तृत जांच करनी है।
खास तौर पर यह देखा जा सकता है कि Amadea Enterprises के जमीन सौदे में अलग-अलग लोगों की वास्तविक भूमिका क्या थी, सरकारी जमीन के ट्रांसफर की प्रक्रिया में किन अधिकारियों ने क्या कदम उठाए और स्टांप ड्यूटी में छूट का दावा किस आधार पर किया गया था।
फिलहाल Mundhwa land deal case में जांच जारी है, जबकि बॉम्बे हाईकोर्ट की ताजा टिप्पणी ने पुलिस की जांच और आरोपियों के चयन को लेकर सवाल जरूर खड़े किए हैं।
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