ऑनलाइन फूड और डाइनिंग प्लेटफॉर्म पर दिखाई जाने वाली कीमतों को लेकर दिल्ली की एक कंज्यूमर कोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है। दिल्ली के नॉर्थ डिस्ट्रिक्ट कंज्यूमर डिस्प्यूट्स रिड्रेसल कमीशन ने Swiggy और एक रेस्टोरेंट को ग्राहक को गलत बुफे कीमत दिखाने के मामले में जिम्मेदार ठहराते हुए संयुक्त रूप से ₹1 लाख का भुगतान करने का आदेश दिया है।

कोर्ट ने साफ कहा कि कोई ऑनलाइन प्लेटफॉर्म खुद को सिर्फ “मध्यस्थ” बताकर उपभोक्ता के सामने दिखाई जाने वाली गलत कीमत की जिम्मेदारी से बच नहीं सकता। आयोग के मुताबिक, प्लेटफॉर्म पर दिखाई गई कीमत और रेस्टोरेंट की वास्तविक कीमत में बड़ा अंतर होने पर उपभोक्ता को गुमराह किया जा सकता है।

क्या है पूरा मामला?

यह मामला दिल्ली के रहने वाले वकील प्रवीण कुमार सिंह की शिकायत से जुड़ा है। शिकायत के मुताबिक, उन्होंने 7 अप्रैल 2024 को Swiggy Dineout के जरिए दिल्ली के केशवपुरम स्थित Themis Barbeque House में टेबल बुक की थी।

बुकिंग के समय Swiggy पर “Cost for two” के तौर पर ₹1,500 की रकम दिखाई जा रही थी। इसका मतलब करीब ₹750 प्रति व्यक्ति बैठता था।

लेकिन रेस्टोरेंट पहुंचने के बाद ग्राहक को बताया गया कि वेज बुफे की कीमत ₹1,050 प्रति व्यक्ति, जबकि नॉन-वेज बुफे की कीमत ₹1,100 प्रति व्यक्ति है।

इस तरह प्लेटफॉर्म पर दिखाई गई कीमत और वास्तविक कीमत में काफी अंतर था।

कीमत में 40 से 47 फीसदी तक का अंतर

कंज्यूमर कमीशन ने अपने आदेश में कहा कि प्लेटफॉर्म पर दिखाई गई रकम की तुलना में वास्तविक कीमत करीब 40 से 47 प्रतिशत अधिक थी।

Swiggy की ओर से दलील दी गई कि ₹1,500 की रकम केवल एक औसत या अनुमानित “Cost for two” थी और ग्राहक बुकिंग से पहले मेन्यू में जाकर वास्तविक कीमत देख सकता था।

हालांकि, आयोग इस दलील से सहमत नहीं हुआ। आयोग ने कहा कि Dineout लिस्टिंग में कहीं भी यह स्पष्ट नहीं किया गया था कि ₹1,500 केवल अनुमानित रकम है या अंतिम बिल इससे अलग हो सकता है।

आयोग के मुताबिक, बुकिंग से पहले किसी ग्राहक को जो कीमत दिखाई जाती है, उससे उसके मन में उसी कीमत के आसपास भुगतान करने की उचित उम्मीद बनती है। इस मामले में वास्तविक कीमत में अंतर इतना ज्यादा था कि इसे मामूली अंतर नहीं माना जा सकता।

Swiggy की भी जिम्मेदारी तय

कमीशन ने कहा कि Swiggy के पास रेस्टोरेंट की वास्तविक और आइटम-वाइज कीमतों तक पहुंच थी। इसके बावजूद प्लेटफॉर्म पर कम “Cost for two” दिखाया जाता रहा और यह प्रमुखता से नहीं बताया गया कि वीकेंड पर बुफे की कीमत अलग हो सकती है।

आयोग ने कहा कि रेस्टोरेंट सेवा देने वाला पक्ष था और Swiggy वह प्लेटफॉर्म था, जहां यह गलत जानकारी उपभोक्ता को दिखाई गई।

इसी आधार पर दोनों को मामले में जिम्मेदार ठहराया गया।

Section 79 का भी दिया गया हवाला

Swiggy ने सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 79 के तहत मिलने वाली intermediary protection का हवाला देते हुए अपनी जिम्मेदारी सीमित करने की कोशिश की।

लेकिन आयोग ने कहा कि Section 79 किसी ऑनलाइन प्लेटफॉर्म को हर परिस्थिति में जिम्मेदारी से छूट नहीं देता। इसके लिए प्लेटफॉर्म को कानून के तहत जरूरी due diligence का पालन करना होता है।

कमीशन ने कहा कि Swiggy यह साबित करने के लिए पर्याप्त सामग्री पेश नहीं कर सका कि वह प्लेटफॉर्म पर दिखाई जाने वाली कीमत और रेस्टोरेंट की वास्तविक बिलिंग कीमत के बीच उचित मिलान सुनिश्चित करने की व्यवस्था कर रहा था।

उपभोक्ता संरक्षण कानून का भी उल्लेख

आयोग ने Consumer Protection (E-commerce) Rules, 2020 का भी हवाला दिया। इन नियमों के तहत ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म पर विक्रेता या सेवा प्रदाता की ओर से दी गई जानकारी सही और वास्तविक सेवा से मेल खानी चाहिए।

कमीशन ने माना कि गलत कीमत लगातार दिखाए जाने से उपभोक्ता को सेवा की वास्तविक लागत के बारे में भ्रमित किया गया। इसे आयोग ने deficiency in service और unfair trade practice माना।

10 फीसदी सर्विस चार्ज पर भी आपत्ति

मामले में सिर्फ बुफे की कीमत ही मुद्दा नहीं थी। ग्राहक ने अपने पेय के बिल पर लगाए गए 10 फीसदी सर्विस चार्ज पर भी आपत्ति जताई थी।

आयोग ने पाया कि रेस्टोरेंट के मेन्यू में इस तरह के सर्विस चार्ज या स्टाफ कंट्रीब्यूशन का स्पष्ट उल्लेख नहीं था, जबकि बिल में इसे “Service Charge” के रूप में दिखाया गया।

आयोग ने दिल्ली हाई कोर्ट के 5 सितंबर 2023 के अंतरिम निर्देशों का भी उल्लेख किया, जिनमें संबंधित परिस्थितियों में “Service Charge” की जगह “Staff Contribution” शब्द के इस्तेमाल से जुड़ी व्यवस्था का जिक्र था।

कमीशन ने माना कि इस मामले में रेस्टोरेंट ने संबंधित निर्देशों का पालन नहीं किया।

चार हफ्ते में देना होगा ₹1 लाख

कंज्यूमर कमीशन ने Swiggy और Themis Barbeque House को शिकायतकर्ता को संयुक्त रूप से ₹1 लाख देने का निर्देश दिया है। यह रकम मानसिक परेशानी, उत्पीड़न, असुविधा और मुकदमेबाजी की लागत के लिए तय की गई है।

आदेश के मुताबिक, दोनों पक्षों को यह भुगतान चार सप्ताह के भीतर करना होगा। ऐसा नहीं होने पर तय अवधि समाप्त होने के बाद पूरी राशि पर 12 फीसदी सालाना ब्याज लागू होगा।

यह फैसला ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर दिखाई जाने वाली कीमतों की सटीकता और उपभोक्ता को दी जाने वाली जानकारी की जिम्मेदारी से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले के रूप में सामने आया है।

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By EDITOR

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