अंतरिक्ष क्षेत्र में अमेरिका और चीन के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा के बीच भारत के सामने अपनी कूटनीतिक और रणनीतिक प्राथमिकताएं तय करने की चुनौती है। भारत जून 2023 में अमेरिका के नेतृत्व वाले आर्टेमिस समझौते पर हस्ताक्षर कर चुका है, वहीं चीन ने 23 अक्टूबर 2026 को अंतरिक्ष के वैश्विक शासन को लेकर अपना प्रस्ताव पेश किया है। पूर्व भारतीय राजनयिक सैयद अकबरुद्दीन का मानना है कि भारत को किसी एक शक्ति के प्रभाव में आने के बजाय हर अंतरिक्ष साझेदारी का आकलन अपने राष्ट्रीय हितों, तकनीकी क्षमता और रणनीतिक स्वतंत्रता के आधार पर करना चाहिए।
अंतरिक्ष अब केवल वैज्ञानिक खोज और अनुसंधान का क्षेत्र नहीं रह गया है। दुनिया की बड़ी शक्तियां इसे तकनीक, सुरक्षा, अर्थव्यवस्था और वैश्विक प्रभाव बढ़ाने के एक महत्वपूर्ण माध्यम के रूप में देख रही हैं। उपग्रह संचार, अंतरिक्ष से मिलने वाला डेटा, चंद्रमा पर संसाधनों की खोज और भविष्य के अंतरिक्ष मिशनों को लेकर देशों के बीच प्रतिस्पर्धा लगातार तेज हो रही है। ऐसे में अंतरिक्ष से जुड़े नियम और समझौते आने वाले समय में वैश्विक राजनीति को भी प्रभावित कर सकते हैं।
भारत के लिए यह स्थिति विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि देश अपने अंतरिक्ष कार्यक्रम का विस्तार कर रहा है और कई ऐसे मिशनों की तैयारी कर रहा है, जिन्हें अकेले पूरा करना अभी आसान नहीं है। इसके लिए भारत को दूसरे देशों के साथ तकनीकी सहयोग, साझा संसाधनों और अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों की जरूरत होगी।
पूर्व भारतीय राजनयिक और संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि रह चुके सैयद अकबरुद्दीन ने अपने लेख में इसी चुनौती की ओर ध्यान दिलाया है। उनके मुताबिक, भारत को अमेरिका और चीन की ओर से सामने आ रहे अंतरिक्ष शासन से जुड़े प्रस्तावों को समझते हुए अपने विकल्प खुले रखने चाहिए। किसी भी साझेदारी में शामिल होने से पहले यह स्पष्ट होना चाहिए कि उससे भारत को क्या लाभ मिलेगा, कौन-सी सीमाएं लागू होंगी और यदि भविष्य में सहयोग समाप्त हो जाता है तो भारत के पास आगे बढ़ने के लिए क्या विकल्प बचेंगे।
अंतरिक्ष के नियमों पर प्रभाव बढ़ाने की कोशिश में चीन
23 अक्टूबर 2026 को चीन ने अंतरिक्ष के वैश्विक शासन को लेकर अपना पोजिशन पेपर यानी आधिकारिक रुख पेश किया। इसका उद्देश्य अंतरिक्ष गतिविधियों से जुड़े अंतरराष्ट्रीय नियमों और उनके निर्धारण की प्रक्रिया में चीन का प्रभाव बढ़ाना है।
चीन चाहता है कि अंतरिक्ष से जुड़े नियम बनाने के लिए संयुक्त राष्ट्र मुख्य मंच बना रहे। उसके प्रस्तावों में निजी और व्यावसायिक अंतरिक्ष कंपनियों की भूमिका, देशों के बीच सूचना साझा करना और अंतरिक्ष में हथियारों की होड़ रोकने जैसे मुद्दे शामिल हैं।
चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने इस प्रस्ताव को बीजिंग के व्यापक वैश्विक शासन एजेंडे के तहत घोषित आठ व्यावहारिक कदमों में शामिल किया था। इस पहल में विकासशील देशों को वैश्विक नियम बनाने की प्रक्रिया में अधिक भागीदारी देने की बात भी कही गई है।
यह प्रस्ताव चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की ग्लोबल गवर्नेंस इनिशिएटिव का हिस्सा है। इसके माध्यम से चीन उन विकासशील देशों का समर्थन हासिल करना चाहता है, जो मौजूदा अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में अपनी भूमिका और प्रभाव को लेकर असंतुष्ट हैं।
कई ऐसे देश हैं जिनकी अर्थव्यवस्था, संचार व्यवस्था और विकास संबंधी गतिविधियां उन उपग्रहों और अंतरिक्ष सेवाओं पर निर्भर हैं, जिनका स्वामित्व उनके पास नहीं है। इन देशों की चिंता है कि अंतरिक्ष से जुड़े नियमों का निर्धारण कुछ शक्तिशाली सरकारें और बड़ी कंपनियां मिलकर कर सकती हैं, जबकि विकासशील देशों को निर्णय लेने की प्रक्रिया में पर्याप्त जगह नहीं मिलेगी।
भारत का अनुभव इस मामले में महत्वपूर्ण हो सकता है। देश ने कृषि, मौसम की जानकारी, आपदा प्रबंधन और संचार जैसी जरूरतों के लिए अंतरिक्ष तकनीक का इस्तेमाल किया है। इसी वजह से भारत उन देशों के साथ सहयोग बढ़ा सकता है, जो सस्ती और भरोसेमंद अंतरिक्ष सेवाओं तक पहुंच चाहते हैं।
निजी अंतरिक्ष कंपनियों की भूमिका पर भी उठ रहे सवाल
चीन के प्रस्ताव का एक महत्वपूर्ण हिस्सा व्यावसायिक अंतरिक्ष कंपनियों की गतिविधियों से जुड़ा है। चीन चाहता है कि निजी अंतरिक्ष कंपनियां किसी देश के संघर्ष या युद्ध में गैरकानूनी तरीके से हस्तक्षेप न करें।
इस मुद्दे को समझने के लिए यूक्रेन युद्ध के दौरान सैटेलाइट इंटरनेट सेवा Starlink की भूमिका का उदाहरण दिया जा सकता है। जब किसी निजी कंपनी का सैटेलाइट नेटवर्क किसी देश की सैन्य गतिविधियों के लिए महत्वपूर्ण बन जाता है, तो उसकी जिम्मेदारी केवल उस कंपनी के पंजीकृत कार्यालय या मुख्यालय तक सीमित नहीं रह जाती।
ऐसी स्थिति में यह सवाल उठता है कि किसी निजी कंपनी की सेवा कब सामान्य व्यावसायिक गतिविधि होती है और कब वह किसी सैन्य संघर्ष में हस्तक्षेप का रूप ले सकती है। यह भी तय करना होगा कि ऐसी गतिविधियों को गैरकानूनी घोषित करने का अधिकार किसके पास होगा।
अकबरुद्दीन के लेख में इस प्रस्ताव को लेकर एक महत्वपूर्ण सवाल उठाया गया है कि क्या चीन अपनी कंपनियों पर भी ऐसे ही नियम लागू करने को तैयार होगा? यानी क्या बीजिंग उन सिद्धांतों को समान रूप से स्वीकार करेगा, जिनकी मांग वह दूसरी निजी अंतरिक्ष कंपनियों के लिए कर रहा है?
यह मुद्दा इसलिए भी अहम है क्योंकि आने वाले समय में निजी कंपनियां उपग्रह संचार, नेविगेशन, निगरानी और अन्य अंतरिक्ष सेवाओं में बड़ी भूमिका निभा सकती हैं। ऐसे में उनके कामकाज के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्पष्ट नियम बनाना जरूरी होगा।
अंतरिक्ष में हथियारों की होड़ रोकना भारत और चीन दोनों के हित में
अंतरिक्ष सुरक्षा और हथियारों की होड़ का मुद्दा भी भारत के लिए महत्वपूर्ण है। चीन ने वर्ष 2007 में एक उपग्रह को नष्ट करने का परीक्षण किया था, जिसके कारण अंतरिक्ष में हजारों मलबे के टुकड़े पैदा हुए। ये टुकड़े लंबे समय तक कक्षा में बने रह सकते हैं और दूसरे उपग्रहों तथा अंतरिक्ष अभियानों के लिए खतरा पैदा कर सकते हैं।
भारत ने भी अपनी एंटी-सैटेलाइट क्षमता का प्रदर्शन किया है। ऐसे में दोनों देशों के सामने यह चुनौती है कि अंतरिक्ष में सैन्य प्रतिस्पर्धा अनियंत्रित न हो और उपग्रहों की सुरक्षा बनी रहे।
चीन के नए प्रस्ताव में अंतरिक्ष में संयम बरतने और हथियारों की होड़ रोकने से जुड़े सिद्धांतों की बात की गई है। हालांकि, इन सिद्धांतों को लागू करने के लिए स्पष्ट कानूनी जिम्मेदारियां, निगरानी और सत्यापन की व्यवस्था कैसी होगी, इस पर अभी विस्तृत सहमति बनना बाकी है।
सिर्फ सिद्धांतों पर सहमत होना पर्याप्त नहीं होगा। यह भी जरूरी है कि सभी देश यह स्पष्ट करें कि वे किन गतिविधियों से बचेंगे और किसी समझौते के उल्लंघन की स्थिति में उसकी जांच कैसे होगी।
भारत पहले ही अमेरिका के आर्टेमिस समझौते का हिस्सा बन चुका है
भारत की अंतरिक्ष कूटनीति में अमेरिका के नेतृत्व वाला आर्टेमिस समझौता भी महत्वपूर्ण है। भारत ने जून 2023 में इस समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। यह समझौता नागरिक अंतरिक्ष अन्वेषण और चंद्रमा सहित अन्य अंतरिक्ष गतिविधियों के लिए कुछ साझा सिद्धांतों को बढ़ावा देता है।
आर्टेमिस समझौते का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत यह है कि चंद्रमा से संसाधनों का इस्तेमाल करना अपने आप में किसी देश की ओर से उस क्षेत्र पर राष्ट्रीय स्वामित्व का दावा नहीं माना जाएगा।
इसके अलावा समझौते में अस्थायी सुरक्षा क्षेत्रों यानी Temporary Safety Zones की व्यवस्था का भी उल्लेख है। इन क्षेत्रों का उद्देश्य अलग-अलग अंतरिक्ष अभियानों के बीच तालमेल बनाना और एक-दूसरे की गतिविधियों में नुकसानदायक हस्तक्षेप से बचना है।
हालांकि, ऐसे सुरक्षा क्षेत्र किसी देश को चंद्रमा के किसी हिस्से का मालिकाना अधिकार नहीं देते। फिर भी इनका आकार, उपयोग और संचालन भविष्य में महत्वपूर्ण हो सकता है। खासकर उन देशों के लिए जो बाद में चंद्रमा पर अपने मिशन भेजेंगे।
भारत के लिए यह समझना जरूरी है कि इन व्यवस्थाओं का व्यावहारिक इस्तेमाल किस तरह होगा और क्या इससे भविष्य में अंतरिक्ष संसाधनों तक दूसरे देशों की पहुंच प्रभावित हो सकती है।
आर्टेमिस समझौता चीन के साथ सहयोग पर रोक नहीं लगाता
अकबरुद्दीन के मुताबिक, भारत के आर्टेमिस समझौते पर हस्ताक्षर करने का अर्थ यह नहीं है कि वह चीन के साथ अंतरिक्ष क्षेत्र में सहयोग नहीं कर सकता। यह समझौता कानूनी रूप से बाध्यकारी संधि नहीं, बल्कि राजनीतिक प्रतिबद्धताओं और सिद्धांतों पर आधारित व्यवस्था है।
इसलिए भारत के पास दूसरे देशों के साथ सहयोग करने की गुंजाइश बनी रहती है। हालांकि, यदि भारत अलग-अलग मंचों पर एक-दूसरे के विपरीत सिद्धांतों का समर्थन करता है, तो इससे कूटनीतिक स्तर पर सवाल उठ सकते हैं।
इसके अलावा अंतरिक्ष मिशनों में तकनीकी निर्भरता भी एक बड़ी चुनौती है। जब किसी मिशन की डिजाइन, उपकरण, सॉफ्टवेयर और डेटा सिस्टम किसी एक साझेदार देश की तकनीक पर आधारित होते हैं, तो बाद में साझेदार बदलना आसान नहीं रहता।
कई बार ऐसा करने के लिए पूरे मिशन की तकनीकी संरचना में बदलाव करना पड़ सकता है। अलग-अलग देशों के तकनीकी प्रतिबंध और परियोजनाओं से जुड़े अनुबंध भी विकल्पों को सीमित कर सकते हैं।
इसका मतलब यह है कि कागजों पर भारत के पास साझेदार बदलने की स्वतंत्रता हो सकती है, लेकिन वास्तविक परिस्थितियों में ऐसा करना काफी महंगा और मुश्किल साबित हो सकता है।
तकनीकी सहयोग जरूरी, लेकिन भारत को अपनी क्षमता भी विकसित करनी होगी
भारत के लिए अंतरिक्ष क्षेत्र में आत्मनिर्भरता और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के बीच संतुलन बनाना जरूरी है। केवल स्वतंत्र रहने के उद्देश्य से दूसरे देशों के साथ सहयोग से इनकार करना भी नुकसानदायक हो सकता है। इससे भारत उन तकनीकों और साझा सुविधाओं से वंचित रह सकता है, जिनकी मदद से ऐसे मिशन पूरे किए जा सकते हैं जिन्हें देश अभी अकेले करने की स्थिति में नहीं है।
लेकिन किसी साझेदारी का लाभ केवल मिशन पूरा होने तक सीमित नहीं होना चाहिए। भारत को यह भी देखना होगा कि सहयोग के दौरान उसके वैज्ञानिक, इंजीनियर और तकनीकी विशेषज्ञ कितनी नई क्षमताएं विकसित कर रहे हैं।
अकबरुद्दीन के अनुसार, बातचीत के दौरान भारतीय पक्ष को कुछ बुनियादी सवाल जरूर पूछने चाहिए। उदाहरण के लिए:
-
भारतीय वैज्ञानिक और तकनीकी टीमें कौन-से उपकरण खुद डिजाइन करना सीखेंगी?
-
मिशन के रखरखाव और संचालन की जिम्मेदारी भारत कितनी स्वतंत्रता से निभा सकेगा?
-
कौन-सी जरूरी तकनीक और सेवाएं भविष्य में भी विदेशी सहायता पर निर्भर रहेंगी?
-
यदि कोई साझेदार देश सहयोग रोक देता है, तो भारत अपने मिशन को कैसे जारी रखेगा?
इन सवालों के जवाब भारत की भविष्य की अंतरिक्ष नीति और अंतरराष्ट्रीय समझौतों का महत्वपूर्ण आधार बन सकते हैं।
BRICS शिखर सम्मेलन में भारत ने अंतरिक्ष हथियार नियंत्रण पर दिया था समर्थन
सितंबर 2026 में नई दिल्ली में आयोजित BRICS शिखर सम्मेलन के दौरान भारत ने अंतरिक्ष में हथियारों की होड़ रोकने के लिए बातचीत का समर्थन किया था। सम्मेलन की घोषणा में अंतरिक्ष सुरक्षा और हथियार नियंत्रण से जुड़े मुद्दों पर वार्ता आगे बढ़ाने की बात कही गई थी।
भारत ने रूस और चीन की ओर से प्रस्तावित संधि के मसौदे को भी अंतरिक्ष में हथियारों की होड़ रोकने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना था।
यह घटनाक्रम इसलिए अहम है क्योंकि भारत पहले ही अमेरिका के नेतृत्व वाले आर्टेमिस समझौते का हिस्सा है। इसके बावजूद भारत ने BRICS मंच पर अंतरिक्ष सुरक्षा और हथियार नियंत्रण को लेकर रूस और चीन की पहल का समर्थन किया।
इससे पता चलता है कि भारत की अंतरिक्ष कूटनीति केवल किसी एक देश या समूह के साथ जुड़ी हुई नहीं है। भारत अलग-अलग अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपने हितों के अनुसार सहयोग कर रहा है।
हालांकि, रूस और चीन के प्रस्ताव को महत्वपूर्ण कदम मानने का अर्थ यह नहीं है कि भारत को उस मसौदे की हर शर्त स्वीकार करनी ही होगी। किसी भी अंतरराष्ट्रीय संधि पर सहमति देने से पहले उसके सभी प्रावधानों और संभावित प्रभावों का मूल्यांकन करना जरूरी होगा।
चीन के साथ सहयोग में रणनीतिक जोखिम को नजरअंदाज नहीं कर सकता भारत
भारत और चीन के बीच सीमा, सुरक्षा और रणनीतिक मुद्दों पर गंभीर मतभेद रहे हैं। दोनों देशों के बीच प्रतिस्पर्धा का असर अंतरिक्ष जैसे संवेदनशील क्षेत्र में सहयोग की संभावनाओं पर भी पड़ सकता है।
अकबरुद्दीन का मानना है कि हर तरह के सहयोग को एक जैसा नहीं माना जा सकता। उदाहरण के लिए, उपग्रहों के बीच टकराव की चेतावनी साझा करना और किसी संवेदनशील अंतरिक्ष ढांचे या जरूरी सेवा के संचालन के लिए दूसरे देश पर निर्भर होना अलग-अलग स्तर के भरोसे की मांग करता है।
भारत को यह भी विचार करना होगा कि क्या किसी गहरे तकनीकी सहयोग के कारण चीन को ऐसी स्थिति मिल सकती है, जहां वह किसी जरूरी सेवा को बाधित करके भारत पर दबाव बना सके।
इसलिए सहयोग का स्तर तय करते समय केवल तत्काल तकनीकी लाभ नहीं, बल्कि दीर्घकालिक सुरक्षा और रणनीतिक परिणामों को भी ध्यान में रखना होगा।
अंतरिक्ष क्षेत्र में निजी कंपनियों की भूमिका बढ़ने से नई चुनौतियां
भारत सरकार ने हाल के वर्षों में अंतरिक्ष क्षेत्र में सुधार किए हैं। इन सुधारों के तहत निजी कंपनियों को अंतरिक्ष गतिविधियों में भाग लेने के अधिक अवसर दिए गए हैं और विदेशी निवेश से जुड़े नियमों में भी ढील दी गई है।
इससे देश में निजी अंतरिक्ष उद्योग के विस्तार की संभावनाएं बढ़ी हैं। अब ISRO के साथ-साथ निजी कंपनियां भी उपग्रह निर्माण, लॉन्च सेवाओं और अन्य अंतरिक्ष आधारित गतिविधियों में भूमिका निभा सकती हैं।
लेकिन इस विस्तार के साथ कुछ जोखिम भी सामने आते हैं। भारत को यह पता लगाना होगा कि कौन-सी जरूरी अंतरिक्ष सेवाएं विदेशी कंपनियों या दूसरे देशों के नियंत्रण पर निर्भर हैं। यदि किसी विदेशी सरकार के फैसले से कोई सेवा बंद हो जाती है, तो उसका असर भारत की संचार, सुरक्षा और अन्य महत्वपूर्ण जरूरतों पर कितना पड़ेगा?
सरकार, ISRO, राजनयिकों, रक्षा योजनाकारों और निजी अंतरिक्ष कंपनियों को मिलकर इन कमजोरियों की पहचान करनी होगी। इसके साथ यह भी तय करना होगा कि किसी जरूरी विदेशी आपूर्तिकर्ता के हटने की स्थिति में भारत कितनी जल्दी उसका विकल्प तैयार कर सकता है।
ऐसी जानकारी के आधार पर ही भारत को अपने अंतरराष्ट्रीय समझौतों और घरेलू तकनीकी निवेश की प्राथमिकताएं तय करनी चाहिए।
भारत विकासशील देशों के साथ अंतरिक्ष सहयोग बढ़ा सकता है
अकबरुद्दीन का सुझाव है कि भारत को केवल अमेरिका और चीन की ओर से आने वाले प्रस्तावों का इंतजार नहीं करना चाहिए। वह खुद भी अंतरिक्ष क्षेत्र में उपयोगी अंतरराष्ट्रीय सहयोग की पहल कर सकता है।
भारत उन विकासशील देशों के साथ साझेदारी बढ़ा सकता है, जिन्हें बाढ़ की आशंका का अनुमान लगाने, फसलों की निगरानी करने और प्राकृतिक आपदाओं से हुए नुकसान का आकलन करने के लिए उपग्रह डेटा की जरूरत होती है।
भारत इन देशों को केवल डेटा उपलब्ध कराने तक सीमित न रहे, बल्कि वहां की स्थानीय टीमों को इस तकनीक का इस्तेमाल करने का प्रशिक्षण भी दे सकता है। इससे संबंधित देशों की अपनी क्षमता विकसित होगी और भारत को भी यह समझने का अवसर मिलेगा कि अंतरिक्ष से जुड़ी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्थाओं में किन समस्याओं का समाधान जरूरी है।
ऐसी साझेदारियां चीन के संयुक्त राष्ट्र प्रस्तावों पर होने वाली बातचीत से स्वतंत्र रूप से भी भारत के लिए उपयोगी साबित हो सकती हैं।
अंतरिक्ष साझेदारी में भारत को किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?
सैयद अकबरुद्दीन के लेख का मुख्य संदेश यह है कि अंतरिक्ष क्षेत्र में भारत को सहयोग और रणनीतिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन बनाना होगा। आने वाले समय में भारत को ऐसे कई मिशनों और परियोजनाओं में दूसरे देशों की मदद की जरूरत पड़ सकती है, जिन्हें अकेले पूरा करना अभी संभव नहीं है।
लेकिन किसी भी साझेदारी को स्वीकार करने से पहले यह समझना जरूरी होगा कि उससे भारत की तकनीकी क्षमता कितनी बढ़ेगी, कौन-सी सीमाएं लागू होंगी और भविष्य में सहयोग खत्म होने पर भारत कितना स्वतंत्र रहेगा।
अंतरिक्ष में किसी देश का मालिकाना हक नहीं है, लेकिन इसके नियमों और तकनीकी ढांचे को प्रभावित करने वाले देश भविष्य में महत्वपूर्ण शक्ति हासिल कर सकते हैं। इसलिए भारत को वैश्विक नियम बनाने की प्रक्रिया में सक्रिय भूमिका निभाने के साथ-साथ अपनी घरेलू क्षमताओं को भी मजबूत करना होगा।
अकबरुद्दीन के अनुसार, किसी भी साझेदारी की असली परीक्षा उस दिन होगी, जब कोई सहयोगी देश भारत से कहेगा कि वह अब मदद नहीं कर सकता। उस स्थिति में भारत अपने मिशन और जरूरी सेवाओं को कितनी स्वतंत्रता से जारी रख पाएगा, यही उसकी वास्तविक रणनीतिक क्षमता का पैमाना होगा।
लेखक परिचय: सैयद अकबरुद्दीन संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि रह चुके हैं। वर्तमान में वह कौटिल्य स्कूल ऑफ पब्लिक पॉलिसी के डीन हैं। लेख में व्यक्त विचार उनके निजी विचार हैं।
अंतरिक्ष क्षेत्र में अमेरिका और चीन के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा के बीच भारत के सामने अपनी कूटनीतिक और रणनीतिक प्राथमिकताएं तय करने की चुनौती है। भारत जून 2023 में अमेरिका के नेतृत्व वाले आर्टेमिस समझौते पर हस्ताक्षर कर चुका है, वहीं चीन ने 23 अक्टूबर 2026 को अंतरिक्ष के वैश्विक शासन को लेकर अपना प्रस्ताव पेश किया है। पूर्व भारतीय राजनयिक सैयद अकबरुद्दीन का मानना है कि भारत को किसी एक शक्ति के प्रभाव में आने के बजाय हर अंतरिक्ष साझेदारी का आकलन अपने राष्ट्रीय हितों, तकनीकी क्षमता और रणनीतिक स्वतंत्रता के आधार पर करना चाहिए।
अंतरिक्ष अब केवल वैज्ञानिक खोज और अनुसंधान का क्षेत्र नहीं रह गया है। दुनिया की बड़ी शक्तियां इसे तकनीक, सुरक्षा, अर्थव्यवस्था और वैश्विक प्रभाव बढ़ाने के एक महत्वपूर्ण माध्यम के रूप में देख रही हैं। उपग्रह संचार, अंतरिक्ष से मिलने वाला डेटा, चंद्रमा पर संसाधनों की खोज और भविष्य के अंतरिक्ष मिशनों को लेकर देशों के बीच प्रतिस्पर्धा लगातार तेज हो रही है। ऐसे में अंतरिक्ष से जुड़े नियम और समझौते आने वाले समय में वैश्विक राजनीति को भी प्रभावित कर सकते हैं।
भारत के लिए यह स्थिति विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि देश अपने अंतरिक्ष कार्यक्रम का विस्तार कर रहा है और कई ऐसे मिशनों की तैयारी कर रहा है, जिन्हें अकेले पूरा करना अभी आसान नहीं है। इसके लिए भारत को दूसरे देशों के साथ तकनीकी सहयोग, साझा संसाधनों और अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों की जरूरत होगी।
पूर्व भारतीय राजनयिक और संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि रह चुके सैयद अकबरुद्दीन ने अपने लेख में इसी चुनौती की ओर ध्यान दिलाया है। उनके मुताबिक, भारत को अमेरिका और चीन की ओर से सामने आ रहे अंतरिक्ष शासन से जुड़े प्रस्तावों को समझते हुए अपने विकल्प खुले रखने चाहिए। किसी भी साझेदारी में शामिल होने से पहले यह स्पष्ट होना चाहिए कि उससे भारत को क्या लाभ मिलेगा, कौन-सी सीमाएं लागू होंगी और यदि भविष्य में सहयोग समाप्त हो जाता है तो भारत के पास आगे बढ़ने के लिए क्या विकल्प बचेंगे।
अंतरिक्ष के नियमों पर प्रभाव बढ़ाने की कोशिश में चीन
23 अक्टूबर 2026 को चीन ने अंतरिक्ष के वैश्विक शासन को लेकर अपना पोजिशन पेपर यानी आधिकारिक रुख पेश किया। इसका उद्देश्य अंतरिक्ष गतिविधियों से जुड़े अंतरराष्ट्रीय नियमों और उनके निर्धारण की प्रक्रिया में चीन का प्रभाव बढ़ाना है।
चीन चाहता है कि अंतरिक्ष से जुड़े नियम बनाने के लिए संयुक्त राष्ट्र मुख्य मंच बना रहे। उसके प्रस्तावों में निजी और व्यावसायिक अंतरिक्ष कंपनियों की भूमिका, देशों के बीच सूचना साझा करना और अंतरिक्ष में हथियारों की होड़ रोकने जैसे मुद्दे शामिल हैं।
चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने इस प्रस्ताव को बीजिंग के व्यापक वैश्विक शासन एजेंडे के तहत घोषित आठ व्यावहारिक कदमों में शामिल किया था। इस पहल में विकासशील देशों को वैश्विक नियम बनाने की प्रक्रिया में अधिक भागीदारी देने की बात भी कही गई है।
यह प्रस्ताव चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की ग्लोबल गवर्नेंस इनिशिएटिव का हिस्सा है। इसके माध्यम से चीन उन विकासशील देशों का समर्थन हासिल करना चाहता है, जो मौजूदा अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में अपनी भूमिका और प्रभाव को लेकर असंतुष्ट हैं।
कई ऐसे देश हैं जिनकी अर्थव्यवस्था, संचार व्यवस्था और विकास संबंधी गतिविधियां उन उपग्रहों और अंतरिक्ष सेवाओं पर निर्भर हैं, जिनका स्वामित्व उनके पास नहीं है। इन देशों की चिंता है कि अंतरिक्ष से जुड़े नियमों का निर्धारण कुछ शक्तिशाली सरकारें और बड़ी कंपनियां मिलकर कर सकती हैं, जबकि विकासशील देशों को निर्णय लेने की प्रक्रिया में पर्याप्त जगह नहीं मिलेगी।
भारत का अनुभव इस मामले में महत्वपूर्ण हो सकता है। देश ने कृषि, मौसम की जानकारी, आपदा प्रबंधन और संचार जैसी जरूरतों के लिए अंतरिक्ष तकनीक का इस्तेमाल किया है। इसी वजह से भारत उन देशों के साथ सहयोग बढ़ा सकता है, जो सस्ती और भरोसेमंद अंतरिक्ष सेवाओं तक पहुंच चाहते हैं।
निजी अंतरिक्ष कंपनियों की भूमिका पर भी उठ रहे सवाल
चीन के प्रस्ताव का एक महत्वपूर्ण हिस्सा व्यावसायिक अंतरिक्ष कंपनियों की गतिविधियों से जुड़ा है। चीन चाहता है कि निजी अंतरिक्ष कंपनियां किसी देश के संघर्ष या युद्ध में गैरकानूनी तरीके से हस्तक्षेप न करें।
इस मुद्दे को समझने के लिए यूक्रेन युद्ध के दौरान सैटेलाइट इंटरनेट सेवा Starlink की भूमिका का उदाहरण दिया जा सकता है। जब किसी निजी कंपनी का सैटेलाइट नेटवर्क किसी देश की सैन्य गतिविधियों के लिए महत्वपूर्ण बन जाता है, तो उसकी जिम्मेदारी केवल उस कंपनी के पंजीकृत कार्यालय या मुख्यालय तक सीमित नहीं रह जाती।
ऐसी स्थिति में यह सवाल उठता है कि किसी निजी कंपनी की सेवा कब सामान्य व्यावसायिक गतिविधि होती है और कब वह किसी सैन्य संघर्ष में हस्तक्षेप का रूप ले सकती है। यह भी तय करना होगा कि ऐसी गतिविधियों को गैरकानूनी घोषित करने का अधिकार किसके पास होगा।
अकबरुद्दीन के लेख में इस प्रस्ताव को लेकर एक महत्वपूर्ण सवाल उठाया गया है कि क्या चीन अपनी कंपनियों पर भी ऐसे ही नियम लागू करने को तैयार होगा? यानी क्या बीजिंग उन सिद्धांतों को समान रूप से स्वीकार करेगा, जिनकी मांग वह दूसरी निजी अंतरिक्ष कंपनियों के लिए कर रहा है?
यह मुद्दा इसलिए भी अहम है क्योंकि आने वाले समय में निजी कंपनियां उपग्रह संचार, नेविगेशन, निगरानी और अन्य अंतरिक्ष सेवाओं में बड़ी भूमिका निभा सकती हैं। ऐसे में उनके कामकाज के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्पष्ट नियम बनाना जरूरी होगा।
अंतरिक्ष में हथियारों की होड़ रोकना भारत और चीन दोनों के हित में
अंतरिक्ष सुरक्षा और हथियारों की होड़ का मुद्दा भी भारत के लिए महत्वपूर्ण है। चीन ने वर्ष 2007 में एक उपग्रह को नष्ट करने का परीक्षण किया था, जिसके कारण अंतरिक्ष में हजारों मलबे के टुकड़े पैदा हुए। ये टुकड़े लंबे समय तक कक्षा में बने रह सकते हैं और दूसरे उपग्रहों तथा अंतरिक्ष अभियानों के लिए खतरा पैदा कर सकते हैं।
भारत ने भी अपनी एंटी-सैटेलाइट क्षमता का प्रदर्शन किया है। ऐसे में दोनों देशों के सामने यह चुनौती है कि अंतरिक्ष में सैन्य प्रतिस्पर्धा अनियंत्रित न हो और उपग्रहों की सुरक्षा बनी रहे।
चीन के नए प्रस्ताव में अंतरिक्ष में संयम बरतने और हथियारों की होड़ रोकने से जुड़े सिद्धांतों की बात की गई है। हालांकि, इन सिद्धांतों को लागू करने के लिए स्पष्ट कानूनी जिम्मेदारियां, निगरानी और सत्यापन की व्यवस्था कैसी होगी, इस पर अभी विस्तृत सहमति बनना बाकी है।
सिर्फ सिद्धांतों पर सहमत होना पर्याप्त नहीं होगा। यह भी जरूरी है कि सभी देश यह स्पष्ट करें कि वे किन गतिविधियों से बचेंगे और किसी समझौते के उल्लंघन की स्थिति में उसकी जांच कैसे होगी।
भारत पहले ही अमेरिका के आर्टेमिस समझौते का हिस्सा बन चुका है
भारत की अंतरिक्ष कूटनीति में अमेरिका के नेतृत्व वाला आर्टेमिस समझौता भी महत्वपूर्ण है। भारत ने जून 2023 में इस समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। यह समझौता नागरिक अंतरिक्ष अन्वेषण और चंद्रमा सहित अन्य अंतरिक्ष गतिविधियों के लिए कुछ साझा सिद्धांतों को बढ़ावा देता है।
आर्टेमिस समझौते का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत यह है कि चंद्रमा से संसाधनों का इस्तेमाल करना अपने आप में किसी देश की ओर से उस क्षेत्र पर राष्ट्रीय स्वामित्व का दावा नहीं माना जाएगा।

इसके अलावा समझौते में अस्थायी सुरक्षा क्षेत्रों यानी Temporary Safety Zones की व्यवस्था का भी उल्लेख है। इन क्षेत्रों का उद्देश्य अलग-अलग अंतरिक्ष अभियानों के बीच तालमेल बनाना और एक-दूसरे की गतिविधियों में नुकसानदायक हस्तक्षेप से बचना है।
हालांकि, ऐसे सुरक्षा क्षेत्र किसी देश को चंद्रमा के किसी हिस्से का मालिकाना अधिकार नहीं देते। फिर भी इनका आकार, उपयोग और संचालन भविष्य में महत्वपूर्ण हो सकता है। खासकर उन देशों के लिए जो बाद में चंद्रमा पर अपने मिशन भेजेंगे।
भारत के लिए यह समझना जरूरी है कि इन व्यवस्थाओं का व्यावहारिक इस्तेमाल किस तरह होगा और क्या इससे भविष्य में अंतरिक्ष संसाधनों तक दूसरे देशों की पहुंच प्रभावित हो सकती है।
आर्टेमिस समझौता चीन के साथ सहयोग पर रोक नहीं लगाता
अकबरुद्दीन के मुताबिक, भारत के आर्टेमिस समझौते पर हस्ताक्षर करने का अर्थ यह नहीं है कि वह चीन के साथ अंतरिक्ष क्षेत्र में सहयोग नहीं कर सकता। यह समझौता कानूनी रूप से बाध्यकारी संधि नहीं, बल्कि राजनीतिक प्रतिबद्धताओं और सिद्धांतों पर आधारित व्यवस्था है।
इसलिए भारत के पास दूसरे देशों के साथ सहयोग करने की गुंजाइश बनी रहती है। हालांकि, यदि भारत अलग-अलग मंचों पर एक-दूसरे के विपरीत सिद्धांतों का समर्थन करता है, तो इससे कूटनीतिक स्तर पर सवाल उठ सकते हैं।
इसके अलावा अंतरिक्ष मिशनों में तकनीकी निर्भरता भी एक बड़ी चुनौती है। जब किसी मिशन की डिजाइन, उपकरण, सॉफ्टवेयर और डेटा सिस्टम किसी एक साझेदार देश की तकनीक पर आधारित होते हैं, तो बाद में साझेदार बदलना आसान नहीं रहता।
कई बार ऐसा करने के लिए पूरे मिशन की तकनीकी संरचना में बदलाव करना पड़ सकता है। अलग-अलग देशों के तकनीकी प्रतिबंध और परियोजनाओं से जुड़े अनुबंध भी विकल्पों को सीमित कर सकते हैं।
इसका मतलब यह है कि कागजों पर भारत के पास साझेदार बदलने की स्वतंत्रता हो सकती है, लेकिन वास्तविक परिस्थितियों में ऐसा करना काफी महंगा और मुश्किल साबित हो सकता है।
तकनीकी सहयोग जरूरी, लेकिन भारत को अपनी क्षमता भी विकसित करनी होगी
भारत के लिए अंतरिक्ष क्षेत्र में आत्मनिर्भरता और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के बीच संतुलन बनाना जरूरी है। केवल स्वतंत्र रहने के उद्देश्य से दूसरे देशों के साथ सहयोग से इनकार करना भी नुकसानदायक हो सकता है। इससे भारत उन तकनीकों और साझा सुविधाओं से वंचित रह सकता है, जिनकी मदद से ऐसे मिशन पूरे किए जा सकते हैं जिन्हें देश अभी अकेले करने की स्थिति में नहीं है।
लेकिन किसी साझेदारी का लाभ केवल मिशन पूरा होने तक सीमित नहीं होना चाहिए। भारत को यह भी देखना होगा कि सहयोग के दौरान उसके वैज्ञानिक, इंजीनियर और तकनीकी विशेषज्ञ कितनी नई क्षमताएं विकसित कर रहे हैं।
अकबरुद्दीन के अनुसार, बातचीत के दौरान भारतीय पक्ष को कुछ बुनियादी सवाल जरूर पूछने चाहिए। उदाहरण के लिए:
-
भारतीय वैज्ञानिक और तकनीकी टीमें कौन-से उपकरण खुद डिजाइन करना सीखेंगी?
-
मिशन के रखरखाव और संचालन की जिम्मेदारी भारत कितनी स्वतंत्रता से निभा सकेगा?
-
कौन-सी जरूरी तकनीक और सेवाएं भविष्य में भी विदेशी सहायता पर निर्भर रहेंगी?
-
यदि कोई साझेदार देश सहयोग रोक देता है, तो भारत अपने मिशन को कैसे जारी रखेगा?
इन सवालों के जवाब भारत की भविष्य की अंतरिक्ष नीति और अंतरराष्ट्रीय समझौतों का महत्वपूर्ण आधार बन सकते हैं।
BRICS शिखर सम्मेलन में भारत ने अंतरिक्ष हथियार नियंत्रण पर दिया था समर्थन
सितंबर 2026 में नई दिल्ली में आयोजित BRICS शिखर सम्मेलन के दौरान भारत ने अंतरिक्ष में हथियारों की होड़ रोकने के लिए बातचीत का समर्थन किया था। सम्मेलन की घोषणा में अंतरिक्ष सुरक्षा और हथियार नियंत्रण से जुड़े मुद्दों पर वार्ता आगे बढ़ाने की बात कही गई थी।
भारत ने रूस और चीन की ओर से प्रस्तावित संधि के मसौदे को भी अंतरिक्ष में हथियारों की होड़ रोकने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना था।
यह घटनाक्रम इसलिए अहम है क्योंकि भारत पहले ही अमेरिका के नेतृत्व वाले आर्टेमिस समझौते का हिस्सा है। इसके बावजूद भारत ने BRICS मंच पर अंतरिक्ष सुरक्षा और हथियार नियंत्रण को लेकर रूस और चीन की पहल का समर्थन किया।
इससे पता चलता है कि भारत की अंतरिक्ष कूटनीति केवल किसी एक देश या समूह के साथ जुड़ी हुई नहीं है। भारत अलग-अलग अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपने हितों के अनुसार सहयोग कर रहा है।
हालांकि, रूस और चीन के प्रस्ताव को महत्वपूर्ण कदम मानने का अर्थ यह नहीं है कि भारत को उस मसौदे की हर शर्त स्वीकार करनी ही होगी। किसी भी अंतरराष्ट्रीय संधि पर सहमति देने से पहले उसके सभी प्रावधानों और संभावित प्रभावों का मूल्यांकन करना जरूरी होगा।
चीन के साथ सहयोग में रणनीतिक जोखिम को नजरअंदाज नहीं कर सकता भारत
भारत और चीन के बीच सीमा, सुरक्षा और रणनीतिक मुद्दों पर गंभीर मतभेद रहे हैं। दोनों देशों के बीच प्रतिस्पर्धा का असर अंतरिक्ष जैसे संवेदनशील क्षेत्र में सहयोग की संभावनाओं पर भी पड़ सकता है।
अकबरुद्दीन का मानना है कि हर तरह के सहयोग को एक जैसा नहीं माना जा सकता। उदाहरण के लिए, उपग्रहों के बीच टकराव की चेतावनी साझा करना और किसी संवेदनशील अंतरिक्ष ढांचे या जरूरी सेवा के संचालन के लिए दूसरे देश पर निर्भर होना अलग-अलग स्तर के भरोसे की मांग करता है।
भारत को यह भी विचार करना होगा कि क्या किसी गहरे तकनीकी सहयोग के कारण चीन को ऐसी स्थिति मिल सकती है, जहां वह किसी जरूरी सेवा को बाधित करके भारत पर दबाव बना सके।
इसलिए सहयोग का स्तर तय करते समय केवल तत्काल तकनीकी लाभ नहीं, बल्कि दीर्घकालिक सुरक्षा और रणनीतिक परिणामों को भी ध्यान में रखना होगा।
अंतरिक्ष क्षेत्र में निजी कंपनियों की भूमिका बढ़ने से नई चुनौतियां
भारत सरकार ने हाल के वर्षों में अंतरिक्ष क्षेत्र में सुधार किए हैं। इन सुधारों के तहत निजी कंपनियों को अंतरिक्ष गतिविधियों में भाग लेने के अधिक अवसर दिए गए हैं और विदेशी निवेश से जुड़े नियमों में भी ढील दी गई है।
इससे देश में निजी अंतरिक्ष उद्योग के विस्तार की संभावनाएं बढ़ी हैं। अब ISRO के साथ-साथ निजी कंपनियां भी उपग्रह निर्माण, लॉन्च सेवाओं और अन्य अंतरिक्ष आधारित गतिविधियों में भूमिका निभा सकती हैं।
लेकिन इस विस्तार के साथ कुछ जोखिम भी सामने आते हैं। भारत को यह पता लगाना होगा कि कौन-सी जरूरी अंतरिक्ष सेवाएं विदेशी कंपनियों या दूसरे देशों के नियंत्रण पर निर्भर हैं। यदि किसी विदेशी सरकार के फैसले से कोई सेवा बंद हो जाती है, तो उसका असर भारत की संचार, सुरक्षा और अन्य महत्वपूर्ण जरूरतों पर कितना पड़ेगा?
सरकार, ISRO, राजनयिकों, रक्षा योजनाकारों और निजी अंतरिक्ष कंपनियों को मिलकर इन कमजोरियों की पहचान करनी होगी। इसके साथ यह भी तय करना होगा कि किसी जरूरी विदेशी आपूर्तिकर्ता के हटने की स्थिति में भारत कितनी जल्दी उसका विकल्प तैयार कर सकता है।
ऐसी जानकारी के आधार पर ही भारत को अपने अंतरराष्ट्रीय समझौतों और घरेलू तकनीकी निवेश की प्राथमिकताएं तय करनी चाहिए।
भारत विकासशील देशों के साथ अंतरिक्ष सहयोग बढ़ा सकता है
अकबरुद्दीन का सुझाव है कि भारत को केवल अमेरिका और चीन की ओर से आने वाले प्रस्तावों का इंतजार नहीं करना चाहिए। वह खुद भी अंतरिक्ष क्षेत्र में उपयोगी अंतरराष्ट्रीय सहयोग की पहल कर सकता है।
भारत उन विकासशील देशों के साथ साझेदारी बढ़ा सकता है, जिन्हें बाढ़ की आशंका का अनुमान लगाने, फसलों की निगरानी करने और प्राकृतिक आपदाओं से हुए नुकसान का आकलन करने के लिए उपग्रह डेटा की जरूरत होती है।
भारत इन देशों को केवल डेटा उपलब्ध कराने तक सीमित न रहे, बल्कि वहां की स्थानीय टीमों को इस तकनीक का इस्तेमाल करने का प्रशिक्षण भी दे सकता है। इससे संबंधित देशों की अपनी क्षमता विकसित होगी और भारत को भी यह समझने का अवसर मिलेगा कि अंतरिक्ष से जुड़ी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्थाओं में किन समस्याओं का समाधान जरूरी है।
ऐसी साझेदारियां चीन के संयुक्त राष्ट्र प्रस्तावों पर होने वाली बातचीत से स्वतंत्र रूप से भी भारत के लिए उपयोगी साबित हो सकती हैं।
अंतरिक्ष साझेदारी में भारत को किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?
सैयद अकबरुद्दीन के लेख का मुख्य संदेश यह है कि अंतरिक्ष क्षेत्र में भारत को सहयोग और रणनीतिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन बनाना होगा। आने वाले समय में भारत को ऐसे कई मिशनों और परियोजनाओं में दूसरे देशों की मदद की जरूरत पड़ सकती है, जिन्हें अकेले पूरा करना अभी संभव नहीं है।
लेकिन किसी भी साझेदारी को स्वीकार करने से पहले यह समझना जरूरी होगा कि उससे भारत की तकनीकी क्षमता कितनी बढ़ेगी, कौन-सी सीमाएं लागू होंगी और भविष्य में सहयोग खत्म होने पर भारत कितना स्वतंत्र रहेगा।
अंतरिक्ष में किसी देश का मालिकाना हक नहीं है, लेकिन इसके नियमों और तकनीकी ढांचे को प्रभावित करने वाले देश भविष्य में महत्वपूर्ण शक्ति हासिल कर सकते हैं। इसलिए भारत को वैश्विक नियम बनाने की प्रक्रिया में सक्रिय भूमिका निभाने के साथ-साथ अपनी घरेलू क्षमताओं को भी मजबूत करना होगा।
अकबरुद्दीन के अनुसार, किसी भी साझेदारी की असली परीक्षा उस दिन होगी, जब कोई सहयोगी देश भारत से कहेगा कि वह अब मदद नहीं कर सकता। उस स्थिति में भारत अपने मिशन और जरूरी सेवाओं को कितनी स्वतंत्रता से जारी रख पाएगा, यही उसकी वास्तविक रणनीतिक क्षमता का पैमाना होगा।
लेखक परिचय: सैयद अकबरुद्दीन संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि रह चुके हैं। वर्तमान में वह कौटिल्य स्कूल ऑफ पब्लिक पॉलिसी के डीन हैं। लेख में व्यक्त विचार उनके निजी विचार हैं।
India Space Policy, ISRO, Artemis Accords, China, Space Diplomacy, Syed Akbaruddin, BRICS Summit 2026, Space Technology, International Relations
