भारत अपने रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को मजबूत करने की दिशा में एक और बड़ा कदम उठाने जा रहा है। स्वदेशी हेलीकॉप्टरों के लिए जरूरी Shakti इंजन के उत्पादन को बढ़ाने के लिए हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) की ओर से एक नई उत्पादन लाइन शुरू की जा रही है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह मंगलवार को ओडिशा के कोरापुट स्थित HAL की इंजन निर्माण सुविधा में Shakti इंजन की दूसरी उत्पादन लाइन का उद्घाटन करेंगे।

नई उत्पादन लाइन का सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि Shakti इंजन के उत्पादन की वार्षिक क्षमता मौजूदा 80 इंजन से बढ़कर 180 इंजन प्रति वर्ष हो जाएगी। यह क्षमता बढ़ोतरी ऐसे समय में की जा रही है जब भारत अपने स्वदेशी हेलीकॉप्टर कार्यक्रमों को तेजी से आगे बढ़ा रहा है और रक्षा उपकरणों के घरेलू उत्पादन पर लगातार जोर दे रहा है।

Shakti इंजन का इस्तेमाल भारत के प्रमुख स्वदेशी हेलीकॉप्टरों में किया जाता है। इनमें Dhruv Advanced Light Helicopter (ALH) और Prachand Light Combat Helicopter (LCH) शामिल हैं। इसलिए इंजन उत्पादन क्षमता में बढ़ोतरी का सीधा संबंध इन हेलीकॉप्टरों की निर्माण और परिचालन जरूरतों से है।

218 करोड़ रुपये के निवेश से तैयार हुई दूसरी उत्पादन लाइन

HAL के बेंगलुरु स्थित संयंत्र में फिलहाल हर साल करीब 80 Ardiden 1H1 Shakti इंजन तैयार किए जाते हैं। अब दूसरी उत्पादन लाइन के जरिए इस क्षमता को बढ़ाया जा रहा है। इस नई लाइन पर करीब 218 करोड़ रुपये का निवेश किया गया है।

Shakti इंजन भारत और फ्रांस की एयरोस्पेस विशेषज्ञता के सहयोग का परिणाम है। इसे फ्रांस की प्रमुख एयरोस्पेस कंपनी Safran के साथ मिलकर विकसित किया गया है।

नई उत्पादन लाइन के शुरू होने के बाद HAL के पास स्वदेशी हेलीकॉप्टर कार्यक्रमों के लिए अधिक संख्या में इंजन तैयार करने की क्षमता होगी। इससे उत्पादन की गति बढ़ाने के साथ-साथ भविष्य की जरूरतों को पूरा करने में भी मदद मिल सकती है।

Dhruv और Prachand के लिए क्यों महत्वपूर्ण है Shakti इंजन?

भारत ने पिछले कुछ वर्षों में हेलीकॉप्टर निर्माण के क्षेत्र में अपनी क्षमता को काफी आगे बढ़ाया है। Dhruv एक बहुउद्देश्यीय स्वदेशी हेलीकॉप्टर है, जबकि Prachand को विशेष रूप से ऊंचाई वाले और चुनौतीपूर्ण इलाकों में सैन्य अभियानों के लिए विकसित किया गया है।

ऐसे में इन हेलीकॉप्टरों की उपलब्धता केवल एयरफ्रेम या असेंबली क्षमता पर निर्भर नहीं करती, बल्कि पर्याप्त संख्या में विश्वसनीय इंजन उपलब्ध होना भी जरूरी है।

इसी वजह से Shakti इंजन के उत्पादन में बढ़ोतरी को भारत के हेलीकॉप्टर कार्यक्रम के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। उत्पादन क्षमता बढ़ने से HAL को भविष्य में बढ़ती मांग के अनुरूप इंजन उपलब्ध कराने में अधिक सुविधा होगी।

Koraput में HAL की बड़ी उपलब्धि, 2,000वां इंजन भी होगा डिलीवर

Shakti इंजन की नई उत्पादन लाइन के उद्घाटन के साथ ही HAL का कोरापुट इंजन डिवीजन मंगलवार को एक और बड़ी उपलब्धि हासिल करेगा। यहां से AL-31FP इंजन का 2,000वां इंजन डिलीवर किया जाएगा।

AL-31FP इंजन भारतीय वायुसेना के Su-30MKI लड़ाकू विमानों को शक्ति देता है। HAL का कोरापुट केंद्र दशकों से भारतीय सैन्य विमानन के लिए विभिन्न प्रकार के एयरो-इंजन तैयार करता रहा है।

इस सुविधा में पहले R-11, R-25, R-29 और RD-33 जैसे इंजनों का उत्पादन किया जा चुका है। इनका इस्तेमाल भारतीय वायुसेना के अलग-अलग MiG विमानों में किया गया है, जिनमें MiG-21, MiG-27 और MiG-29 शामिल हैं।

इस लिहाज से कोरापुट का HAL संयंत्र भारत की सैन्य विमानन निर्माण क्षमता में लंबे समय से महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहा है।

Su-30MKI के लिए 26 हजार करोड़ रुपये का करार

भारत के सबसे महत्वपूर्ण लड़ाकू विमान कार्यक्रमों में से एक Su-30MKI के लिए भी HAL की इंजन निर्माण क्षमता अहम है।

करीब दो साल पहले रक्षा मंत्रालय ने HAL के साथ 240 AL-31FP एयरो-इंजन की आपूर्ति के लिए लगभग 26,000 करोड़ रुपये का करार किया था। इस समझौते के तहत HAL को हर साल लगभग 30 इंजन तैयार करने हैं और पूरी डिलीवरी आठ वर्षों में पूरी की जानी है।

भारतीय वायुसेना के पास करीब 260 Su-30MKI विमान हैं। दुर्घटनाओं में खोए विमानों की भरपाई के लिए 12 अतिरिक्त लड़ाकू विमान भी शामिल किए जाने हैं।

HAL के अनुमान के मुताबिक, Su-30MKI बेड़े के पूरे जीवनकाल में भारतीय वायुसेना को करीब 900 इंजनों की जरूरत पड़ सकती है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि देश के भीतर इंजन उत्पादन की क्षमता बढ़ाना कितना महत्वपूर्ण है।

रूस से मिली तकनीक के आधार पर भारत में बन रहा AL-31FP इंजन

AL-31FP इंजन का निर्माण कोरापुट में कच्चे माल के स्तर से किया जा रहा है। इस कार्यक्रम में रूस से टेक्नोलॉजी ट्रांसफर का इस्तेमाल किया गया है।

हालांकि इंजन निर्माण से जुड़े कुछ स्पेयर पार्ट्स, फोर्जिंग और कास्टिंग अभी भी आयात किए जाने की उम्मीद है। लेकिन धीरे-धीरे घरेलू उत्पादन और स्वदेशी सामग्री की हिस्सेदारी बढ़ाने पर काम किया जा रहा है।

बताया गया है कि अंतिम चरण में तैयार किए जाने वाले इंजनों में स्वदेशी सामग्री की हिस्सेदारी 63 प्रतिशत तक पहुंच सकती है। इससे भारत की घरेलू रक्षा सप्लाई चेन और विनिर्माण क्षमता को मजबूत करने में मदद मिलेगी।

रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता के लिए इंजन सबसे बड़ी चुनौती

भारत पिछले कई वर्षों से रक्षा उपकरणों के मामले में आयात पर निर्भरता कम करने की कोशिश कर रहा है। देश ने लड़ाकू विमान, हेलीकॉप्टर, मिसाइल, रडार और अन्य रक्षा प्रणालियों के घरेलू निर्माण में काफी प्रगति की है।

लेकिन एयरो-इंजन का निर्माण दुनिया की सबसे जटिल तकनीकी क्षमताओं में से एक माना जाता है। किसी लड़ाकू विमान या हेलीकॉप्टर का इंजन उसकी सबसे महत्वपूर्ण प्रणालियों में शामिल होता है। इसमें अत्यधिक तापमान, दबाव और गति पर लगातार काम करने वाली जटिल तकनीक की जरूरत होती है।

इसी वजह से भारत के लिए रक्षा प्लेटफॉर्म बनाने के साथ-साथ उनके इंजन की घरेलू क्षमता विकसित करना रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है।

रक्षा मंत्रालय भी लगातार इस बात पर जोर देता रहा है कि भारत को केवल रक्षा उपकरण खरीदने वाले देश के बजाय एक बड़े रक्षा विनिर्माता के रूप में आगे बढ़ना होगा।

प्रधानमंत्री मोदी भी दे चुके हैं स्वदेशी जेट इंजन पर जोर

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पिछले वर्ष देश में जेट इंजन निर्माण की जरूरत पर जोर दे चुके हैं। भारत के लिए यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि देश के स्वदेशी लड़ाकू विमान कार्यक्रमों में इंजन की उपलब्धता एक महत्वपूर्ण चुनौती रही है।

भारत का लक्ष्य आने वाले वर्षों में अपनी सैन्य जरूरतों के लिए ज्यादा से ज्यादा रक्षा प्रणालियों का निर्माण देश के भीतर करना है। इसके लिए केवल असेंबली या अंतिम निर्माण ही नहीं, बल्कि इंजन, इलेक्ट्रॉनिक्स, सेंसर और अन्य महत्वपूर्ण तकनीकों की घरेलू क्षमता भी विकसित करनी होगी।

LCA Mk-1A कार्यक्रम में भी इंजन की भूमिका अहम

भारत का Light Combat Aircraft (LCA) Mk-1A कार्यक्रम भी इंजन से जुड़ी चुनौतियों से प्रभावित हुआ है। इस कार्यक्रम में अमेरिकी कंपनी GE Aerospace से F404-IN20 इंजन की आपूर्ति में देरी समेत कई कारणों से विमान की डिलीवरी प्रभावित हुई है।

वहीं, HAL और GE Aerospace के बीच भारत में F414 इंजन के संयुक्त उत्पादन को लेकर बातचीत चल रही है। F414 इंजन को भविष्य के अधिक उन्नत LCA Mk-2 कार्यक्रम के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

अगर भारत में F414 जैसे इंजन के उत्पादन की व्यवस्था आगे बढ़ती है, तो इससे भविष्य के लड़ाकू विमान कार्यक्रमों में विदेशी आपूर्ति पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है।

Safran और Rolls-Royce के साथ भी भारत की बातचीत

भारत घरेलू एयरो-इंजन क्षमता विकसित करने के लिए कई वैश्विक कंपनियों के साथ काम कर रहा है। इनमें फ्रांस की Safran और ब्रिटेन की Rolls-Royce जैसी प्रमुख कंपनियां शामिल हैं।

Shakti इंजन पहले से ही भारत और Safran के बीच सहयोग का उदाहरण है। अब भारत इस तरह के अंतरराष्ट्रीय सहयोग के जरिए भविष्य के लिए और अधिक उन्नत इंजन तकनीक हासिल करने और घरेलू उत्पादन क्षमता विकसित करने की कोशिश कर रहा है।

भारत के लिए क्यों अहम है यह कदम?

Shakti इंजन की दूसरी उत्पादन लाइन शुरू होना केवल HAL की उत्पादन क्षमता बढ़ाने का मामला नहीं है। इसका संबंध भारत के स्वदेशी हेलीकॉप्टर कार्यक्रम, रक्षा उत्पादन और लंबे समय में एयरो-इंजन के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता से भी है।

नई लाइन के बाद सालाना उत्पादन क्षमता 80 से बढ़कर 180 इंजन हो जाएगी। इससे Dhruv और Prachand जैसे स्वदेशी हेलीकॉप्टरों की इंजन जरूरतों को पूरा करने में मदद मिल सकती है।

वहीं, Koraput में AL-31FP का 2,000वां इंजन तैयार होना इस बात को दिखाता है कि HAL लंबे समय से भारत के सैन्य विमानन क्षेत्र के लिए इंजन निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

भारत के सामने अब अगली बड़ी चुनौती और अधिक उन्नत जेट इंजन तकनीक विकसित करना है। यदि देश इस क्षेत्र में अपनी क्षमता मजबूत करने में सफल होता है, तो भविष्य के लड़ाकू विमान और हेलीकॉप्टर कार्यक्रमों में विदेशी इंजन पर निर्भरता कम करने की दिशा में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है।

Share this News

By EDITOR

0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest
0 Comments
Oldest
Newest Most Voted
0
Would love your thoughts, please comment.x
()
x