सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को 26 सप्ताह की गर्भवती महिला की गर्भपात कराने की याचिका खारिज कर दी। महिला ने पति के साथ वैवाहिक विवाद, मानसिक प्रताड़ना और अपमान का हवाला देते हुए गर्भावस्था समाप्त करने की अनुमति मांगी थी। अदालत ने कहा कि मौजूदा विवाह में आपसी सहमति से ठहरी गर्भावस्था को केवल इसलिए समाप्त करने की अनुमति नहीं दी जा सकती कि गर्भधारण के बाद पति-पत्नी के बीच मतभेद पैदा हो गए हैं। जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस आर महादेवन की पीठ ने दोनों पक्षों को सुनने और दंपती से बातचीत करने के बाद यह फैसला सुनाया।
देश की सर्वोच्च अदालत ने गर्भपात से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया कि वैवाहिक संबंधों में आई परेशानियां अपने आप में 26 सप्ताह की गर्भावस्था समाप्त करने का कानूनी आधार नहीं बन जातीं। महिला के वकील ने अदालत में कहा था कि वह इस गर्भावस्था को आगे जारी नहीं रखना चाहती और इसके कारण गंभीर मानसिक तनाव से गुजर रही है। इसके बावजूद सुप्रीम कोर्ट ने मामले के तथ्यों और मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (MTP) कानून के प्रावधानों को देखते हुए याचिका मंजूर करने से इनकार कर दिया।
यह मामला इसलिए भी अहम है क्योंकि महिला की गर्भावस्था 24 सप्ताह की वैधानिक सीमा पार कर चुकी थी। अदालत के सामने सवाल था कि क्या असाधारण परिस्थितियों में संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी विशेष शक्तियों का इस्तेमाल करके गर्भावस्था समाप्त करने की अनुमति दी जा सकती है।
सुप्रीम कोर्ट ने क्यों खारिज की गर्भपात की याचिका?
जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस आर महादेवन की पीठ ने कहा कि यह मामला उन मामलों से अलग है, जिनमें बलात्कार पीड़िताओं, नाबालिगों या MTP कानून के तहत निर्धारित अन्य विशेष श्रेणियों के कारण गर्भावस्था समाप्त करने की अनुमति पर विचार किया जाता है।
पीठ ने कहा कि इस मामले में गर्भावस्था पति-पत्नी के बीच सहमति से बने वैवाहिक संबंध के दौरान हुई थी। गर्भधारण के बाद दोनों के बीच मतभेद पैदा हुए। अदालत के मुताबिक, केवल इन मतभेदों के आधार पर गर्भावस्था समाप्त करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
सुनवाई के दौरान पीठ ने कहा कि विवाह और आपसी सहमति से गर्भधारण के बाद किसी भी समय पति-पत्नी के बीच विचारों का अंतर हो सकता है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि वह पति के पक्ष में कोई नया अधिकार स्थापित नहीं कर रही, बल्कि यह देख रही है कि क्या वैवाहिक मतभेद के कारण पत्नी को गर्भावस्था समाप्त करने की अनुमति दी जा सकती है।
पीठ ने सवाल उठाया कि पति के साथ समस्या होने का असर गर्भ में पल रहे बच्चे पर क्यों पड़ना चाहिए। अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने और दंपती से बातचीत करने के बाद महिला की याचिका खारिज कर दी।
महिला ने पति पर मानसिक प्रताड़ना और चरित्र पर सवाल उठाने का लगाया आरोप
महिला की ओर से अदालत में बताया गया कि पति के साथ उसके संबंधों में गंभीर तनाव है। उसने पहले भी पति पर मानसिक उत्पीड़न और अपमान करने के आरोप लगाए थे।
सुनवाई के दौरान महिला ने पीठ को बताया कि उसके पति ने परिवार के सदस्यों और दोस्तों के बीच एक वीडियो प्रसारित किया था। इस वीडियो के जरिए कथित तौर पर उसके चरित्र पर सवाल उठाए गए और विवाहेतर संबंध होने के आरोप लगाए गए थे।
महिला के वकील ने दलील दी कि इन घटनाओं के कारण वह गंभीर मानसिक पीड़ा से गुजर रही है। गर्भावस्था जारी रखने से उसका मानसिक तनाव और बढ़ सकता है। वकील ने अदालत के सामने मेडिकल रिपोर्ट का भी हवाला दिया, जिसमें महिला की मनोवैज्ञानिक स्थिति को लेकर चिंता दर्ज की गई थी।
महिला की ओर से कहा गया कि गर्भावस्था जारी रखने या विवाह को बचाए रखने की उसकी कोई इच्छा नहीं है। उसकी मांग थी कि उसके निजी जीवन, शारीरिक स्वायत्तता और अपने शरीर से जुड़े फैसले लेने के अधिकार को ध्यान में रखते हुए गर्भपात की अनुमति दी जाए।
पति ने मांगी माफी, बच्चे की देखभाल करने की भी जताई इच्छा
दूसरी ओर, पति भी सुप्रीम कोर्ट में पेश हुआ। उसकी ओर से अदालत को बताया गया कि उसने पत्नी के साथ संबंध सुधारने और सुलह करने की कोशिश की थी, लेकिन महिला ने गर्भावस्था समाप्त करने की शर्त रखी थी।
पति के वकील ने बताया कि 2 नवंबर को अदालत में एक हलफनामा दाखिल किया गया था। इसमें पति ने बिना किसी शर्त के माफी मांगी थी। उसने यह भी कहा था कि परिवार के व्हाट्सऐप ग्रुप में साझा किए गए चैट और वीडियो को हटा दिया गया है।
पति की ओर से एक और महत्वपूर्ण दलील दी गई। उसके वकील ने कहा कि यदि पत्नी बच्चे को जन्म देने के बाद उसकी देखभाल नहीं करना चाहती, तब भी पति बच्चे की जिम्मेदारी उठाने के लिए तैयार है। उसने यहां तक कहा कि वह बच्चे की परवरिश करने के लिए अविवाहित रहने को भी तैयार है।
हालांकि, महिला ने अदालत को बताया कि पति के साथ दोबारा संबंध स्थापित करने की कोई संभावना नहीं है। उसने साफ किया कि वह इस विवाह को आगे जारी रखने के पक्ष में नहीं है।
24 सप्ताह की सीमा और MTP कानून पर अदालत में हुई बहस
इस मामले में गर्भावस्था की अवधि भी फैसले का एक बड़ा आधार रही। महिला की गर्भावस्था लगभग 26 सप्ताह की हो चुकी थी, जबकि मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (MTP) कानून के तहत सामान्य तौर पर गर्भपात की अनुमति के लिए 24 सप्ताह तक की वैधानिक सीमा निर्धारित है। इसके आगे गर्भावस्था समाप्त करने के लिए कानून में तय विशेष परिस्थितियों और अपवादों पर विचार करना होता है।
महाराष्ट्र सरकार की ओर से पेश अधिवक्ता देवांशी सिंह ने महिला की याचिका का विरोध किया। उन्होंने अदालत को बताया कि गर्भावस्था 24 सप्ताह से आगे बढ़ चुकी है और महिला का मामला MTP कानून तथा उसके नियमों के तहत निर्धारित किसी अपवाद की श्रेणी में नहीं आता।
सरकार की ओर से यह भी दलील दी गई कि गर्भ में पल रहा भ्रूण जीवित रहने में सक्षम है। देवांशी सिंह ने कहा कि यदि सुप्रीम कोर्ट अनुच्छेद 142 के तहत गर्भपात की अनुमति देता है, तब भी लगभग 26 सप्ताह के भ्रूण की स्थिति और उसके हृदय की धड़कन रोकने से जुड़े गंभीर पहलुओं पर विचार करना होगा।
उन्होंने आशंका जताई कि यदि इस तरह के मामले में अनुमति दी जाती है, तो भविष्य में वैवाहिक विवाद का हवाला देकर गर्भावस्था के काफी बाद के चरणों में भी गर्भपात की मांग की जा सकती है। उन्होंने अदालत से कहा कि कानून में तय सीमाओं को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए और किसी न किसी स्तर पर स्पष्ट सीमा तय करना जरूरी है।
अनुच्छेद 142 के इस्तेमाल पर भी उठा सवाल
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर भी विचार किया कि क्या संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अदालत को मिली असाधारण शक्तियों का इस्तेमाल इस मामले में किया जाना चाहिए।
अनुच्छेद 142 सुप्रीम कोर्ट को किसी मामले में पूर्ण न्याय सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक आदेश देने की शक्ति देता है। महिला की ओर से इसी विशेष अधिकार क्षेत्र के तहत गर्भावस्था समाप्त करने की अनुमति मांगी गई थी।
हालांकि, पीठ ने मामले की परिस्थितियों और MTP कानून की वैधानिक सीमाओं को ध्यान में रखते हुए इस राहत को देने से इनकार कर दिया।
अदालत ने यह भी कहा कि महिला यदि विवाह से बाहर निकलना चाहती है तो वह ऐसा कर सकती है, लेकिन पति बच्चे को छोड़ने के लिए तैयार नहीं है। पीठ ने यह संभावना भी तलाशने की कोशिश की कि क्या बच्चे का जन्म दंपती को अपने मतभेदों पर दोबारा विचार करने का अवसर दे सकता है।
जब अदालत ने महिला से पूछा कि क्या वह सुलह की एक और कोशिश कर सकती है, तो उसने स्पष्ट रूप से कहा कि पति के साथ वापस जाने की कोई संभावना नहीं है।
मेडिकल बोर्ड ने मानसिक स्थिति को लेकर जताई थी चिंता
इस मामले में मेडिकल रिपोर्ट भी महत्वपूर्ण रही। मुंबई के ग्रांट गवर्नमेंट मेडिकल कॉलेज और सर जेजे ग्रुप ऑफ हॉस्पिटल्स की ओर से गठित मेडिकल बोर्ड ने महिला की जांच की थी।
मेडिकल बोर्ड ने अपनी रिपोर्ट में महिला की मनोवैज्ञानिक स्थिति को नाजुक बताया था। रिपोर्ट के अनुसार, यदि गर्भावस्था जारी रहती है तो महिला की मानसिक पीड़ा और गंभीर हो सकती है।
बोर्ड ने यह भी कहा था कि गर्भावस्था समाप्त करने की प्रक्रिया की जा सकती है, लेकिन इसके साथ नवजात शिशु को लेकर गंभीर चिकित्सकीय चुनौतियां हो सकती हैं। रिपोर्ट में आशंका जताई गई थी कि जन्म के बाद बच्चे को नवजात गहन चिकित्सा इकाई (NICU) में रखने की जरूरत पड़ सकती है और ऐसी देखभाल के बावजूद उसके ठीक होने की संभावना को लेकर स्थिति अनिश्चित रह सकती है।
मेडिकल बोर्ड की राय में गर्भावस्था जारी रखने से महिला की मानसिक स्थिति पर पड़ने वाले प्रभाव का उल्लेख था, जबकि दूसरी ओर गर्भ में पल रहे भ्रूण और संभावित समय से पहले जन्म के चिकित्सकीय जोखिम भी सामने थे।
बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले के बाद सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था मामला
महिला ने सबसे पहले बॉम्बे हाईकोर्ट में गर्भावस्था समाप्त करने की अनुमति के लिए याचिका दाखिल की थी। हालांकि, 26 अक्टूबर को हाईकोर्ट ने उसकी याचिका खारिज कर दी थी।
हाईकोर्ट ने कहा था कि महिला का मामला MTP कानून और उसके नियमों के तहत 24 सप्ताह तक गर्भावस्था समाप्त करने की अनुमति देने वाली निर्धारित श्रेणियों में नहीं आता। अदालत ने यह भी ध्यान दिया था कि पति-पत्नी का विवाह अभी कायम है और भ्रूण में किसी तरह की जन्मजात असामान्यता नहीं पाई गई है।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा था कि महिला की ओर से लगातार मानसिक क्रूरता और उत्पीड़न के जो आरोप लगाए गए हैं, वे उस स्तर पर स्थापित नहीं हुए हैं, जिससे कानून के तहत गर्भावस्था समाप्त करने की अनुमति दी जा सके।
हाईकोर्ट से राहत नहीं मिलने के बाद महिला ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। वहां भी उसने अपनी मानसिक स्थिति, पति के साथ विवाद और गर्भावस्था जारी रखने की अनिच्छा को आधार बनाकर याचिका दाखिल की थी।
सुप्रीम कोर्ट ने पहले भी दंपती को सुलह का मौका देने को कहा था
सुप्रीम कोर्ट में पिछली सुनवाई के दौरान पीठ ने दंपती को अपने छह महीने पुराने विवाह को एक और मौका देने की सलाह दी थी। अदालत ने पति को पत्नी के खिलाफ लगाए गए आरोप वापस लेने और परिवार के व्हाट्सऐप ग्रुप में माफी मांगने का निर्देश भी दिया था।
इसके बाद पति ने 2 नवंबर को हलफनामा दाखिल कर बिना शर्त खेद जताया। उसने परिवार के व्हाट्सऐप ग्रुप में साझा किए गए चैट और वीडियो हटाने की बात भी कही।
लेकिन पति की ओर से माफी और सुलह की कोशिशों के बावजूद महिला गर्भावस्था जारी रखने के लिए तैयार नहीं हुई। उसने अदालत को बताया कि वह न तो इस विवाह को जारी रखना चाहती है और न ही बच्चे को जन्म देना चाहती है।
सुप्रीम कोर्ट ने अंतिम फैसला सुनाते हुए याचिका की खारिज
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने, मेडिकल रिपोर्ट पर विचार करने और दंपती से बातचीत करने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने महिला की याचिका खारिज कर दी।
पीठ ने अपने आदेश में कहा कि मामले के तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए याचिका में मांगी गई राहत नहीं दी जा सकती।
हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि इस कार्यवाही के दौरान दोनों पक्षों की ओर से दाखिल किए गए दस्तावेज और दलीलें भविष्य में होने वाली किसी अन्य कानूनी कार्यवाही में किसी भी पक्ष के खिलाफ पूर्वाग्रह का आधार नहीं बनेंगी।
इस फैसले के साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने लगभग 26 सप्ताह की गर्भावस्था समाप्त करने की महिला की मांग को स्वीकार नहीं किया। मामले में अदालत के सामने वैवाहिक विवाद, महिला की मानसिक स्थिति, भ्रूण की चिकित्सकीय स्थिति और गर्भपात से जुड़े कानूनी प्रावधान जैसे कई पहलू थे।
सुप्रीम कोर्ट ने वैवाहिक विवाद के आधार पर 26 सप्ताह की गर्भावस्था समाप्त करने की महिला की याचिका खारिज कर दी। जानिए MTP कानून, मेडिकल रिपोर्ट और अदालत की पूरी सुनवाई।
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