उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक दलों ने जातीय समीकरण साधने की कवायद तेज कर दी है। इसी कड़ी में भारतीय जनता पार्टी (BJP) अब राज्य के ऊंची जाति के मतदाताओं, खासकर ब्राह्मण समुदाय के बीच अपनी पहुंच और मजबूत करने की तैयारी में है। पार्टी एक तरफ ब्राह्मणों समेत अन्य सवर्ण समुदायों से जुड़े मुद्दों पर बातचीत बढ़ाएगी, वहीं दूसरी तरफ गैर-प्रमुख और पिछड़े वर्गों के बीच अपने पुराने सामाजिक समीकरण को भी बनाए रखने पर जोर देगी।
उत्तर प्रदेश की राजनीति में जातीय समीकरण लंबे समय से चुनावी रणनीति का अहम हिस्सा रहे हैं। ऐसे में चुनाव से पहले ब्राह्मण मतदाताओं को लेकर BJP, समाजवादी पार्टी (SP), कांग्रेस और बहुजन समाज पार्टी (BSP) के बीच मुकाबला और तेज होता दिखाई दे रहा है।
ब्राह्मण वोट क्यों है महत्वपूर्ण?
उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण मतदाताओं की हिस्सेदारी करीब 10 से 12 फीसदी मानी जाती है। संख्या के लिहाज से यह समुदाय OBC वर्ग से छोटा है, लेकिन राज्य की करीब 403 विधानसभा सीटों में लगभग 100 सीटों पर इसका प्रभाव महत्वपूर्ण माना जाता है। खासकर मध्य और पूर्वी उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण मतदाताओं की भूमिका चुनावी नतीजों को प्रभावित कर सकती है।
BJP के एक राज्य स्तरीय पदाधिकारी के मुताबिक, पार्टी को लंबे समय से ऊंची जातियों, विशेष रूप से ब्राह्मण समुदाय का समर्थन मिलता रहा है। हालांकि पिछले कुछ समय में पार्टी और ब्राह्मण समुदाय के बीच दूरी को लेकर चर्चाएं सामने आई हैं। BJP अब इन चिंताओं को दूर करने के लिए समुदाय के स्तर पर संवाद बढ़ाने की तैयारी कर रही है।
जातीय समूहों के साथ बैठकें करेगी BJP
पार्टी की रणनीति के तहत अलग-अलग जातीय समूहों के साथ बैठकें और कार्यक्रम आयोजित किए जाने की योजना है। इन बैठकों में संबंधित समुदायों की समस्याओं और राजनीतिक अपेक्षाओं को समझने पर जोर दिया जाएगा।
BJP का फोकस केवल ब्राह्मणों तक सीमित नहीं रहेगा। पार्टी पहले की तरह गैर-प्रमुख OBC और अन्य वंचित समुदायों के बीच भी अपना आधार मजबूत करने की कोशिश जारी रखेगी। सामाजिक कल्याण योजनाओं और राजनीतिक प्रतिनिधित्व के जरिए इन वर्गों तक पहुंच बनाने की रणनीति BJP के लिए पहले भी महत्वपूर्ण रही है।
ब्राह्मणों में नाराजगी की चर्चा
पार्टी के भीतर के कुछ नेताओं का मानना है कि पिछले कुछ वर्षों में ब्राह्मण समुदाय के एक हिस्से में यह धारणा बनी कि पार्टी ने उनकी समस्याओं और राजनीतिक भागीदारी पर अपेक्षाकृत कम ध्यान दिया। इनमें सरकारी और संगठनात्मक पदों में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिलने जैसे मुद्दे शामिल बताए जाते हैं।
BJP के एक पूर्व विधायक ने दावा किया कि गैर-प्रमुख OBC समुदायों को अपने साथ जोड़ने की रणनीति के दौरान ब्राह्मणों के मुद्दों पर पार्टी का ध्यान कुछ कम हुआ। उन्होंने यह भी कहा कि समुदाय के भीतर आर्थिक रूप से कमजोर लोगों की अपनी अलग समस्याएं हैं, जिनका समाधान केवल राजनीतिक प्रतिनिधित्व से नहीं हो सकता।
हालांकि BJP ने समय-समय पर ब्राह्मण समुदाय को राजनीतिक प्रतिनिधित्व दिया है। 2017 में दिनेश शर्मा और 2022 में ब्रजेश पाठक को उपमुख्यमंत्री बनाए जाने को भी इसी संदर्भ में देखा गया था।
‘ठाकुरवाद’ की चर्चा भी बनी मुद्दा
उत्तर प्रदेश की राजनीति में पिछले कुछ वर्षों के दौरान ‘ठाकुरवाद’ को लेकर भी राजनीतिक बहस होती रही है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ठाकुर समुदाय से आते हैं और BJP के भीतर ब्राह्मणों के एक वर्ग की नाराजगी को लेकर ऐसी चर्चाएं समय-समय पर सामने आती रही हैं।
हालांकि पार्टी से जुड़े नेताओं का कहना है कि ब्राह्मण समुदाय को BJP से अलग मानना सही नहीं होगा। उनका तर्क है कि ब्राह्मण अभी भी BJP के व्यापक हिंदू वोट बैंक का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं और पार्टी चुनाव से पहले इस समर्थन को और मजबूत करने की कोशिश करेगी।
SP के PDA में ‘Pandit’ की चर्चा
समाजवादी पार्टी भी ब्राह्मण मतदाताओं को अपने साथ जोड़ने की कोशिश कर रही है। SP के ‘PDA’ यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक सामाजिक गठजोड़ में ‘पिछड़ा’ शब्द को ‘पंडित’ से जोड़ने की राजनीतिक चर्चा ने भी इस रणनीति को नया आयाम दिया है।
BJP नेताओं का कहना है कि SP की यह कोशिश पार्टी के लिए बड़ी चुनौती नहीं है। BJP का दावा है कि ब्राह्मण मतदाता व्यापक हिंदू वोट बैंक का हिस्सा हैं और पार्टी उनके बीच अपनी पकड़ बनाए रखने में सक्षम होगी।
कांग्रेस और BSP भी ब्राह्मण वोट पर सक्रिय
ब्राह्मण मतदाताओं को लेकर सिर्फ BJP और SP ही सक्रिय नहीं हैं। कांग्रेस और BSP भी इस समुदाय को अपने पक्ष में लाने की कोशिश कर रही हैं।
कांग्रेस ने हाल ही में मोना मिश्रा को उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष नियुक्त किया है। वहीं BSP प्रमुख और उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने भी ब्राह्मणों समेत ऊंची जातियों के उम्मीदवारों को अधिक प्राथमिकता देने की बात कही है।
BSP ने 2007 के चुनाव में ब्राह्मणों समेत विभिन्न सामाजिक समूहों को जोड़कर मजबूत सामाजिक गठबंधन बनाया था और पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई थी। पार्टी अब उसी तरह के सामाजिक समीकरण को दोबारा मजबूत करने की कोशिश कर रही है।
समाजवादी पार्टी भी ब्राह्मण नेताओं और मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए अधिक राजनीतिक प्रतिनिधित्व और टिकट देने की बात कर रही है। ऐसे में आगामी विधानसभा चुनाव से पहले ब्राह्मण वोट को लेकर सभी प्रमुख दलों के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ती दिख रही है।
पिछले चुनाव में BJP ने दिए थे 68 ब्राह्मण उम्मीदवार
पिछले विधानसभा चुनाव में BJP ने उत्तर प्रदेश की 403 सीटों में से 255 सीटों पर जीत दर्ज की थी। रिपोर्ट के मुताबिक, BJP ने 68 ब्राह्मण उम्मीदवारों को टिकट दिया था। वहीं BSP ने 70 और समाजवादी पार्टी ने करीब 40 ब्राह्मण उम्मीदवारों को मैदान में उतारा था।
आगामी चुनाव में टिकट वितरण भी इस सामाजिक समीकरण का एक महत्वपूर्ण संकेतक होगा। ब्राह्मण समुदाय को कितनी राजनीतिक हिस्सेदारी मिलती है और अलग-अलग दल अपने उम्मीदवार चयन में किस तरह का संतुलन बनाते हैं, इस पर भी राजनीतिक नजरें रहेंगी।
BJP के सामने चुनौती सामाजिक समीकरण को संतुलित रखने की
BJP के लिए सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ ब्राह्मण वोट को मजबूत करना नहीं, बल्कि अलग-अलग सामाजिक समूहों के बीच संतुलन बनाए रखना है। पार्टी पिछले वर्षों में गैर-प्रमुख OBC और अन्य वंचित वर्गों को अपने साथ जोड़कर एक व्यापक सामाजिक गठबंधन बनाने में सफल रही है।
अब चुनावी तैयारी के दौरान BJP ब्राह्मणों और अन्य ऊंची जातियों के साथ संवाद बढ़ाने के साथ-साथ अपने OBC और अन्य सामाजिक आधार को भी बनाए रखना चाहती है।
उत्तर प्रदेश में चुनावी राजनीति में जातीय समीकरण की अहम भूमिका को देखते हुए आने वाले महीनों में इन समुदायों के बीच राजनीतिक पहुंच और प्रतिनिधित्व को लेकर गतिविधियां और तेज होने की संभावना है। ऐसे में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि BJP का नया आउटरीच प्लान कितना प्रभावी रहता है और SP, BSP तथा कांग्रेस इसके मुकाबले किस तरह की रणनीति अपनाते हैं।
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