India vs West Indies ODI Series: भारत ने वेस्टइंडीज के खिलाफ तीन मैचों की वनडे सीरीज 2-1 से अपने नाम कर ली, लेकिन आखिरी मुकाबले में मिली हार ने टीम की कुछ अहम कमजोरियों को सामने ला दिया। खासतौर पर तेज गेंदबाजी, पावरप्ले और डेथ ओवरों में विकेट लेने की क्षमता के साथ-साथ खराब कैचिंग ने टीम मैनेजमेंट की चिंता बढ़ाई है।
न्यू चंडीगढ़ में खेले गए तीसरे वनडे में भारत के पास सीरीज 3-0 से जीतने का मौका था। भारतीय टीम ने मुकाबले में मजबूत स्थिति बनाई, लेकिन वेस्टइंडीज ने आखिरी ओवरों में तेजी से रन बनाते हुए लक्ष्य हासिल कर लिया। इस प्रदर्शन ने अगले साल होने वाले वनडे वर्ल्ड कप से पहले भारत की गेंदबाजी की गहराई को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं।
डेथ ओवरों में नहीं रोक पाया भारत
वेस्टइंडीज को आखिरी समय में 24 गेंदों पर 44 रन की जरूरत थी। उस समय मोहम्मद सिराज के ओवर बाकी थे, लेकिन भारत ने अनुभवी तेज गेंदबाज से गेंदबाजी नहीं कराई। दूसरी तरफ शाई होप और गुडाकेश मोती ने भारतीय गेंदबाजों पर दबाव बनाना शुरू कर दिया।
धीरे-धीरे मैच भारत के हाथ से निकल गया और वेस्टइंडीज ने 10 गेंद बाकी रहते लक्ष्य हासिल कर लिया। आखिरी चरण में महज 14 गेंदों में 44 रन बना दिए गए, जिससे भारतीय गेंदबाजी योजनाओं और उनके क्रियान्वयन पर सवाल उठे।
इस दौरान धीमी ओवर गति के कारण भारत को 30 गज के घेरे के बाहर सिर्फ चार फील्डर रखने की अनुमति थी। इसका भी वेस्टइंडीज के बल्लेबाजों ने फायदा उठाया।
युवा गेंदबाजों को मौका मिला, लेकिन प्रदर्शन उम्मीद के मुताबिक नहीं रहा
भारत ने इस सीरीज में कई नए गेंदबाजों को आजमाया। जसप्रीत बुमराह, अर्शदीप सिंह और अक्षर पटेल की गैरमौजूदगी में गुरनूर बराड़, नमन धीर, औकीब नबी और अंशुल कंबोज जैसे खिलाड़ियों को अपनी दावेदारी मजबूत करने का मौका मिला।
हालांकि, इन खिलाड़ियों का प्रदर्शन बहुत प्रभावशाली नहीं रहा।
गुरनूर बराड़ ने न्यू चंडीगढ़ में 9.1 ओवर में 64 रन दिए। इससे पहले गुवाहाटी वनडे में भी उन्होंने 96 रन खर्च किए थे। इंग्लैंड के खिलाफ लॉर्ड्स में भी उन्होंने 10 ओवर में 97 रन दिए थे और उन्हें कोई विकेट नहीं मिला था। लगातार महंगे साबित होने के कारण उनकी गेंदबाजी पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
गौतम गंभीर ने किया था युवा गेंदबाजों का बचाव
गुवाहाटी वनडे के बाद भारतीय मुख्य कोच गौतम गंभीर ने गुरनूर बराड़ का बचाव किया था। गंभीर का कहना था कि युवा गेंदबाजों को मुश्किल परिस्थितियों में गेंदबाजी करने का अनुभव देना जरूरी है।
गंभीर ने यह भी माना था कि बल्लेबाजों के लिए अनुकूल पिचों पर गेंदबाजों के लिए काम आसान नहीं होता। उनके मुताबिक, ऐसी परिस्थितियों में गेंदबाजों को थोड़ा समय और मौके दिए जाने चाहिए, ताकि वे दबाव वाली परिस्थितियों से सीख सकें।
नबी और कंबोज के लिए भी अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट की कठिन परीक्षा
दूसरे वनडे में अंतरराष्ट्रीय डेब्यू करने वाले औकीब नबी ने 8.5 ओवर में 84 रन खर्च किए। उन्हें गेंद से लय हासिल करने में परेशानी हुई।
वहीं प्रसिद्ध कृष्णा के चोटिल होने के बाद टीम में शामिल किए गए अंशुल कंबोज ने अपने डेब्यू मैच में नौ ओवर में 82 रन दिए। इससे एक बार फिर यह चुनौती सामने आई कि घरेलू क्रिकेट में अच्छा प्रदर्शन करने वाले खिलाड़ियों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तुरंत सफलता मिलना कितना मुश्किल हो सकता है।
भारत का कंबोज और नमन धीर जैसे खिलाड़ियों को चुनना टीम में बल्लेबाजी की गहराई बढ़ाने की रणनीति को भी दिखाता है। कंबोज का नंबर-8 पर बल्लेबाजी करने में सक्षम होना टीम के लिए उपयोगी है, लेकिन अगर गेंदबाज दबाव के समय विकेट नहीं निकाल पाते तो एक अतिरिक्त ऑलराउंडर की उपयोगिता भी सीमित हो जाती है।
शुभमन गिल ने भी मानी गेंदबाजी की कमजोरी
भारतीय कप्तान शुभमन गिल ने माना कि चोटों और व्यस्त कार्यक्रम की वजह से टीम अपनी पसंद की पूरी गेंदबाजी इकाई के साथ नहीं खेल सकी। हालांकि, उन्होंने कहा कि ऐसी परिस्थितियां दूसरे खिलाड़ियों के लिए खुद को साबित करने का अच्छा मौका भी हैं।
गिल ने खासतौर पर पावरप्ले और डेथ ओवरों की गेंदबाजी को भारत के लिए चिंता का विषय बताया। उनका कहना था कि अगर पावरप्ले में शुरुआती विकेट नहीं मिलते हैं तो बीच के ओवरों में विकेट निकालना मुश्किल हो जाता है, खासकर तब जब फील्डिंग प्रतिबंधों के कारण सीमारेखा के बाहर कम फील्डर मौजूद हों।
गिल ने यह भी संकेत दिया कि वर्ल्ड कप को देखते हुए अब प्रयोग के लिए ज्यादा समय नहीं बचा है। भारतीय टीम को उम्मीद होगी कि अगली सीरीज से प्रमुख खिलाड़ी उपलब्ध रहें और टीम अपने पसंदीदा संयोजन को लगातार आजमा सके।
बल्लेबाजी मजबूत, लेकिन गेंदबाजी पर जल्द फैसला जरूरी
भारत की बल्लेबाजी फिलहाल राहत देने वाली तस्वीर पेश कर रही है। रोहित शर्मा, विराट कोहली, शुभमन गिल और केएल राहुल जैसे बल्लेबाज अच्छी लय में नजर आ रहे हैं। ऐसे में रन बनाने के मोर्चे पर भारतीय टीम के पास पर्याप्त अनुभव और विकल्प मौजूद हैं।
लेकिन वनडे क्रिकेट में सिर्फ मजबूत बल्लेबाजी से बड़े टूर्नामेंट नहीं जीते जा सकते। खासकर सपाट पिचों पर विकेट लेने वाले गेंदबाज और दबाव के समय रन रोकने की क्षमता बेहद अहम होती है।
वेस्टइंडीज के खिलाफ सीरीज ने भारत को अगले साल के वनडे वर्ल्ड कप से पहले एक अहम संकेत दिया है। मुख्य गेंदबाजों की वापसी के बावजूद बैकअप पेसर्स की तैयारी, पावरप्ले में शुरुआती विकेट, डेथ ओवरों की गेंदबाजी और कैचिंग जैसे क्षेत्रों में सुधार करना टीम के लिए जरूरी होगा।
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